१५ अगस्त और २६ जनवरी की कुछ यादें साझा करना चाह रही हूँ.तिरंगे के रंगों में व्यंजन बनाना...तीन रंगोंकी बर्फी,तीन रंगोंकी खीर,तीन रंगोंका केक,(जो तसवीर में दिख रहा है),तीन रंगों की पूडियां,तीन रंगों के फल,sandwiches,तीन रंगों का पुलाव...और ना जाने क्या,क्या...जून के माह से मै आज़ादी की बधाई देने वाले कार्ड्स बनाने लग जाती...हर कार्ड अलग...हर कार्ड पे अलग सन्देश..जैसे:"मेरी बीना के तार हो मिले हुए,एक भीनी मधुर झंकार उठे,मेरी माता के सरपे ताज रहे",या,"खादी का कफ़न हो मुझपे पड़ा,वन्देमातरम आवाज़ रहे,मेरी माताके सरपे ताज रहे".घर की दरों दीवारें सजतीं..कभी केसरिया रंगों में( जैसे चित्र में दिखाई दे रहा है),तो कभी हरा तो कभी सफ़ेद...या फिर इन तीनों रंगों के समन्वय से.आँगन में रंगोली..वही तीन रंगों में,वंदनवार बनता...गेंदे की पंखुड़ियां ,मोतिया के फूल और हरी पत्तीयाँ... तिरंगा भी इन्हीं से...सुबह से रेडिओ शुरू रहता..."आवाज़ दो हम एक हैं,'(रफ़ी...उनके जैसे कौमी गीत तो किसी ने गए नही),"वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो",इस देश को रखना मेरे बच्चों संभालके","चलो झूमते सरसे बांधे कफन,लहू माँगता है ज़मीने वतन"(लता","ए मेरे वतनके लोगों",और न जाने कितने गीत कान और मन तृप्त करते रहते.
सखी सहेलियों को पहले से ताकीद रहती की,वेशभूषा तिरंगे के रंगों से मेल खाती होनी चाहिए.देश्भाक्तिपर गीतों से क्विज़ शुरू होता.तोहफे भी इन्हीं तीन रंगों में होते...किसीको हरा दुपट्टा तो किसीको सफ़ेद कुरता!कुशन covers टेबल mats ,आदि सब मै घर में इन्हीं रंगसंगती से बनाती.
"झंडा उंचा रहे हमारा",ये प्रार्थना गीत ज़रूर होता.
गांधी,जागृती, जैसी फिल्मों का टीवी पे इंतज़ार रहता.
आज तो वो गाने ना जाने कहाँ गायब हो गए? सुनाई नहीं देते!
पाँच साल पहले जब हम यहाँ रहने आए तो पूरी सोसाइटी में ७५ से अधिक निमंत्रण १० अगस्तको भेजे,१५ अगस्त पे रखे नाश्ते और कुछ खेलके.सोचा १० या १५ लोग तो आही जायेंगे! और एकभी नही आया.बस उस बार से परिवार ,सखी सहेलियाँ कुछ ऐसी बिखरी की,फिर इन दो त्योहारों के दिन,जो मेरे लिए होली ,दिवाली,ईद सबसे अधिक अहमियत रखते थे,मै मनाही नही सकी. हाँ! मिठाई बना अडोस पड़ोस में भेज देती हूँ! एक बार किसी ने पूछा"" आज क्या मौक़ा है?"
मैंने कहा,"१५ अगस्त हैना!"
वो बोली," हाँ,हाँ वो तो पता है,पर मौक़ा क्या है? जनम दिन है किसी का?"
मै:"अपनी आज़ादी का जनम दिन जो है!"
वो थोड़ी सकपका गयी.जिस नैमत को कहते हैं आज़ादी,
हम भूल गए उसे इतनी जल्दी?
भूल गए शहादत शहीदों की?
भूल गए क़ुरबानी बा बापूकी?
बच्चों को कहते नही,
के संभालके रखो आज़ादी,
बड़ी मुश्किलों से ये है पाई,
क्यों करते नही इसकी क़द्रदानी?
आप सभी को आज़ादी का यह पर्व बहुत,बहुत मुबारक हो!
पार कर दो सरहदें जो दिलों में ला रही दूरियाँ!
इंसान से इंसान तकसीम हो,खुदा ने कब चाहा?
