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शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

ख्वाबोंकी रह्गुज़र

खादी सिल्क के कपडे पे पहले जल रंगों  से रंग  भर दिया और ऊपर से कढाई कर दी.रास्तेका जो रंग है,वही कपडेका मूल रंग था.

हक़ीक़त की बंजर डगर से,
आओ ज़रा-सा  हटके चलें,
चलो ,ले चलूँ हँसी नज़ारों में,
ख्वाबोंकी शत रंगी रह्गुज़रमे!
छाँव घनेरी ,धूप प्यारी  सुनहरी,
दूर के उजालों की सुने सदाए,
उलझा लो दामन को सपनों से,
चले जाना जब असलियत बुलाये!

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

तलाश--एक क्षणिका...


रही तलाश इक दिए की,
ता-उम्र इस शमा को,
कभी उजाले इतने तेज़ थे,
की, दिए दिखायी ना दिए,
या जानिबे मंज़िल  अंधेरे थे,
दिए जलाये ना दिए गए......