ये रहा मेरा नैहर का मकान जो एक ज़माने में ऐसा दिखा करता था !दादा दादीमाँ की मृत्यु के पश्च्यात भाई को वास्तु के अनुसार मकान की छेड़छाड़ करने की सूझी और वो सिमेंट का एक block बन के रह गया! बल्कि,रहने लायक ही नही रहा और माँ पिताजी वहाँ से ज़रा अलग हटके दूसरा मकान बनाना पड़ गया! खैर! ये वास्तु मेरे दादा-दादी की स्मुतियों के साथ इतनी अधिक जुडी थी,की,याद आती रहती है!
आज जब मुंबई जैसे कुछ महानगर छोड़,बरसात ने फिर एक बार मूह मोड़ लिया है तो दादा-दादी की कई सारी बातें याद आ रही हैं. उन में से एक प्रमुख बात थी पानी का मितव्यय,या यूँ कहें,सही इस्तेमाल.
महमानों को दिया झूठा पानी तक फिंकता नही था.एक बाल्टी में इकट्ठा होता और पौधों को दिया जाता. लोक मज़ाक उड़ाते लेकिन दादा कहते,"आपलोग जब छूके पानी फेंक देते हैं,तो लगता है,मानो किसी का खून फिंक रहा है!"
तबतक पर्यावरण वाद ये शब्द किसी ने सुना नही था.
जब कभी इलाके में क़हत पड़ता तो गाँव के लोग हमारे कूए का रूख कर लेते.पास के शहर के लोग भी स्नानादि के लिए हमारे घर ही आते.उनके कपडे भी वहीँ धुलते. किसी किस्म का पानी कभी फेंकने नही दिया जाता.वो बड़े ड्रम्स में जमा होता और सफाई के लिए इस्तेमाल होता या पेड़-पौधे आदि को दिया जाता.बैल भैंस को भी उसी पानी से धोया जाता. बर्तन धुलके बचा पानी साग सब्ज़ी की क्यारियों में पड़ता. हम सभी टब में खड़े हो नहाते.वो पानी गुसल खानों तथा बरामदों की सफाई के लिए इस्तेमाल होता. साबुन का पानी शाम में मजदूरों के पैर धोने के लिए इस्तेमाल में आता. कहने का मतलब ये की पानी कभी भी किसी भी हाल में बहाया नही जाता.
क़हत में जब गाँव के लोग कुए से पानी लेने आते तो उनके साथ,आता,दूध,फल आदि बाँध के साथ दिया जाता. उनके जानवरों के लिए घर पे एक ख़ास मिकदार में घांस काट के रखी जाती जो उनके साथ दी जाती. मज़ेकी और दुःख की बात यह,की,यही लोग रात में अपने जानवरों को हमारे खेतों में चरने के लिए छोड़ देते!
ये सभी आदतें क़ुदरत की नैमत,जिसे पानी कहते हैं(और जीवन भी) बचाके इस्तेमाल करने की बेहतरीन सीख थी ! पानी जब इफरात से होता तब भी यही नियम जारी रहता. दादा पानी को देशका खून कहते.
लेकिन मेरे ब्याह के बाद इन्हीं बातों को लेके मुझे सब से अधिक परेशानी उठानी पडी !पानी संभाल के इस्तेमाल करना हमारे अपने लिए कितना ज़रूरी है ये बात मेरे परिवार को समझाना बेहद कठिन रहा!
आज जब कभी पानी की बहुत किल्लत होती है तो मै अपनी कामवाली बाई को गुसलखाने धोने से मना कर देती हूँ,जिन्हें मै स्वयं साफ़ करती हूँ.वही बात बर्तनों की. उसे सिखाना बहुत मुश्किल की,पानी बेदर्दी से ना बहाए! खुद कर लेना अधिक आसान!
पिछले कुछ दिनों पूर्व मुझसे किसी ने कहा,"एक तुम बचत कर लोगी तो क्या होगा?"
तो भाई बूँद बूँद से ही तो सागर बनता है! और क्या कहूँ? जिन लोगों को पानी की किल्लत की सब से अधिक दिक्कत उठानी पड़ती है,मै देखती हूँ,वही लोग सब से अधिक बेदर्दी से पानी बरबाद करते हैं! नलकों में पूरी ज़ोर से बहते पानी की आवाज़ मुझे ऐसी लगती है,मानो कोई मृत्यु शय्या पे पडा हो और जीते जी उसका खून बह रहा हो!
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रविवार, 22 अगस्त 2010
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