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मंगलवार, 22 मार्च 2011

तनहा,तनहा....



सर्दियों का मौसम था. हम लोग एक और मित्र परिवार के साथ भरतपूर Bird sanctuary देखने गए थे.
एक शाम, मै अकेली गेस्ट हॉउस के बरामदेमे बैठी  हुई थी. उस अतीव नीरवता में पंछिओं का कलरव बहुत प्यारा लग रहा था. अचानक,मेरा ध्यान पास ही के एक जलाशय पे गया. Heron जातिका बगुला एक पैर पे स्तब्ध खड़ा अपना शिकार ढूँढ रहा था. आस पास तो बहुत  परिंदे थे,लेकिन ये जलाशय  दूर दूर तक सूना पड़ा हुआ था.
आसमान में अब शाम के रंग ख़त्म हो चुके थे.निशाने चुपके चुपके अपने आगमन का पैगाम पहुँचा दिया था!

मैंने अपना सिलाई कढाई का डिब्बा खोला और  उस वक़्त के आसमान और जलाशय बनानेके लिए  ज़रूरी कपडे के तुकडे,धागे,रंग आदि का जुगाड़ करने लगी.

एक सफ़ेद सिल्क के टुकड़े को ग्रे जलरंग से रंग लिया. उसके बीचो  बीच  हल्का नीला/ग्रे रंग का raw सिल्क का टुकडा सिल दिया. वहाँ पे सीधे तिरछे टाँकों से घाँस फूँस बना ली. कढाई से पेड़ और परिंदा बन गए. नीचे जो घाँस की पातें दिख रही हैं,उन्हें बनाया है,स्टार्च किये हुए शिफोन के तुकडे में से! उस तुकडे में से पत्तियों के आकार काट लिए और सिल दिए! गोल फ्रेम तो घर लौटने पे बना.
इस चित्र को जब कभी देखती हूँ,तो नितांत सूना पन मन में भर आता है.... लगता है,दूर दूर तक कहीँ इंसानी बस्ती नहीं! बस इसी ख़याल में से उभरी ये रचना!


ओ! सुन, आसमान वाले, मेरा कहना!
मुझे इतनी अकेली कभी  न करना! 
शाम ढले,कोई तो साथ हो मेरा अपना, 
मुझ पे तनहाई का यूं  सितम मत ढाना, 
दूर हों दुनिया में वो प्रियतम चाहे जहाँ,
यादों के साथ,उन्हें भी पास ले आना!