मैंने पिछले आलेख में सोचा था,की,माँ बेटी के रिश्ते पे अधिक प्रकाश डालूँगी...लेकिन नही डाल पायी..
अजीब-सी मनस्थिती बनी हुई है. जानती हूँ,की,ये गहरा डिप्रेशन है...उभरना चाहती,हूँ,पर और अधिक डूबती जा रही हूँ...कारण केवल माँ-बेटी के दरमियान का मन मुटाव नही है. बेटी को तो मैंने कबका माफ़ कर दिया...बल्कि उसे दोषी पाया ही नही...मै तो स्वयं को ही दोषी मान के चली हूँ.
इधर मेरी ये हालत है,की,ना लेखन में मन लगता है,ना बागवानी में,ना सिलाई कढ़ाई में. अवस्था बहुत भयावह है...मै खुद इसका बयान नही कर पा रही हूँ...इसी कारण ब्लॉग पे कुछ लिखा भी नही. ब्लॉग पे कुछ पढने में भी मन नही लगता...हालाँकि कोशिश करती रहती हूँ...नही मालूम की,इस अवस्था से कब और किस तरह बाहर निकल पाऊँगी..दवाई भी ले रही हूँ,लेकिन सब कुछ जैसे बेअसर है...
बस....फिलहाल इतना ही...फिर एक बार अपने ब्लॉगर दोस्तों के आगे एक सवाल पेश कर रही हूँ...करूँ तो क्या करूँ?