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शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

दास्ताँ एक औरत की।

लाख ज़हमतें , हज़ार तोहमतें,
चलती रही,काँधों पे ढ़ोते हुए,
रातों की बारातें, दिनों के काफ़िले,
छत पर से गुज़रते रहे.....
वो अनारकली तो नही थी,
ना वो उसका सलीम ही,
तानाशाह रहे ज़माने,
रौशनी गुज़रती कहाँसे?
बंद झरोखे,बंद दरवाज़े,
क़िस्मत में लिखे थे तहखाने..

 महिला जिसे मैंने बहुत करीब से जाना और जो अब अपने आखरी पल गिन रही है,ये चंद  पंक्तियाँ उसीके बारेमे कुछ साल पहले लिखी थीं।