यह भित्ती चित्र केवल कढाई से बनाया है... जब कभी इस चित्र को या डाल पे बैठे,या फिर आसमान में उड़ने वाले परिन्दोको देखती हूँ ,तो मुझे वो लोग याद आ जाते हैं,जिनके बारे में लिखने जा रही हूँ!मै अपने शहर के (महानगर के )बगीचे में घूमने जाया करती हूँ. घूमने के बाद अक्सर एक बेंच पे कुछ देर बैठ जाती. उसी बेंच पे एक अधेड़ उम्र की महिला को अक्सर बैठा देखती. मेरा घूमना ख़त्म होने से पहले वह अक्सर चली जाया करती. साथ एक बच्चा होता. उसकी उम्र यही कोई ४ या ५ साल की होगी. एक युवा जोड़ा शाम ६ बजे की करीब बगीचे में आता. वह चारों साथ,साथ चले जाया करते.
एक दिन शायद उस जोड़े को आने में देर हो गयी और मै उस महिला के साथ बेंच पे बैठ गयी. मुझे देख वह बड़े स्नेह से मुस्कुरायी, जैसे पुरानी पहचान हो. कुछ संभाषण शुरू करने के इरादे से मैंने उससे कहा:" बच्चा बड़ा प्यारा है..आपका पोता है न? या नाती?"
महिला मंद,मंद मुस्काते हुए बोली::" समझ लो दोनों है..वह कहते हैं ना,two in one!"
मै काफ़ी चकरा गयी ! बोली: " ओह! वो कैसे? "
महिला:" या यूँ कहें,उसने मुझे दादी या नानी के तौर से अपना लिया है!"
मै:" यह तो बड़ी गूढ़ बात है...! पहेली लग रही है!"
महिला:" हाँ अक्सर मेरी यह बात लोगों को पहेली लगती है. जीवन ही जहाँ अनबुझ पहेली है,वहाँ एक और पहेली सही!"
इतने में वह युवा जोड़ा आ गया. उन्हें दूरसे आते देख मैंने कहा:" आपके बहु बेटा आ गए..पर कल मै इस पहेली का जवाब लेके ही मानूँगी ....हाँ वरना आपके पीछे चली आउँगी! मेरे दिमाग में खलबली मच गयी है!"
वह हँस दी और मेरे काँधे को हलके-से थपक, बच्चे की ओर बढ़ गयी. वो चारों हँसते,बोलते चले गए.
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अगले दिन शाम,जैसे ही वह मुझे बेंच पे दिखी,मै उस के पास जा बैठी और बोली:" मै आपको कैसे संबोधित करूँ? मासी कहूँ?
मासी:" हाँ,हाँ! यह बहुत अच्छा रिश्ता होता है! "
मै:" तो अब पहेली सुलझा दीजिये ना मासी!"
मासी:" मेरा एक बेटा था...तीन साल पूर्व उसकी एक अपघात में मौत हो गयी. यह जो मुझे लेने आती है,वह उसकी पत्नी...जब यह हादसा हुआ,वह गर्भवती थी. सदमे के कारण उसका गर्भपात हो गया. हमारा बड़ा सुखी,छोटा-सा परिवार था. क़िस्मत के आगे क्या कर सकते हैं?
"बहू कॉलेज में पढ़ाती थी. वह काम तो था उसके पास. लेकिन बड़ी उदास रहती. उसे देख,मै भी बड़ी उदास रहती. इस संसार में मेरा अन्य कोई नही था. बहू की माँ तो वह स्कूल में थी,तभी गुज़र गयी थी. पिता मानो,बेटी को ज़िंदगी में स्थायिक करने के लिए जी रहे थे. उसके ब्याह के चंद माह बाद वो भी दिल के दौरा पड़ने के कारण चल बसे. ना भाई ना बहन.
"बहू ने मानो बैराग ले लिया हो...बेरंग कपडे,न गहने ना सिंगार..एक दिन मै उसके पीछे पड़ गयी,कहा,तुम जैसे पहले रहती थीं,वैसे ही रहा करो.तुम्हें ऐसे देखती हूँ,तो मेरे दिलपे छुरी चल जाती है.
" धीरे, धीरे उसने मेरा मन रखना शुरू कर दिया. चंद लोगों ने उसे ताने दिए. कहने लगे,कोई मिल गया होगा कॉलेज में..और इसी बात पे मैंने सोचना शुरू कर दिया...भला हो निंदकों का...मैंने उसका पुनर्विवाह करने की ठान ली. मैंने अपने एक रिश्ते की बहन को मेरी मनीषा बताई. उसने भी वर तलाशना शुरू कर दिया. चंद हफ़्तों बाद उसका मुझे फोन आया-दीदी, एक लड़का है..डॉक्टर है.उसका एक बेटा है.विधुर है.वह शादी करना चाह रहा है, और कहता है,की,किसी विधवा से ही करूंगा. मै बात आगे बढ़ाऊं?
"मैंने तुरंत हाँ कर दी."
इतने में वह जोड़ा आ गया. और बातें वहीँ रुक गयीं. मै अगले दिन का इंतज़ार करने लगी.
क्रमश:
(कल यह दास्ताँ पूरी हो जायेगी!)
