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शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

उतारूँ कैसे?


इक बोझ-सा है मनमे,
उतारूँ कैसे?
कहने को बहुत कुछ है,
कहूँ कैसे?
वो अल्फाज़ कहाँसे लाऊं,
जिन्हें तू सुने?
वो गीत सुनाऊं कैसे,
जो तूभी गाए?
लिखा था कभी रेत पे,
हवा ले गयी उसे...
गीत लिखे थे पानी पे,
बहा गयी लहरें उन्हें!
ना कागज़ है, ना क़लम है,
दास्ताँ सुनाऊँ कैसे?
ख़त्म नही होती राहें,
मै संभालूँ कैसे?
इक बोझ-सा है मनमे,
उतारूँ कैसे?

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

soonee galee kaa mod....

रुको ,मै  अभी  आया ,
कह के जानेवाला,
कभी नही लौटा,
ना कहता तो सब्र होता,
सूनी गली के मोडको,
या द्वार के चौखट को,
परछाई या आहट को,
बैठे, बैठे,मन ना तकता..