एक राह अकेली-सी.....
आसमान नीले रंगका सिल्क। रास्ता बना है हाथ कारघेसे बने सिल्क के पुराने दुपट्टेके तुकडेमे से........जिसपे मैंने तर्खानी होते समय, लकडी का भूसा जमा कर लिया और उपरसे चिपका दिया....आगेकी और जो घांस आदि दिख रहा है, वो पहले तो एक छापा हुआ कपड़े का टुकडा है...उपरसे, कुछ पेंट और कुछ कढाई....पेड़ पूरी तरहसे कढाई करके बनाया है... ये चित्र मैंने एक यादगार तसवीर परसे बनाया गया है....
पगडंडी,बुलाती है आज भी,
सपनों में आती है,बनके टेढ़ी मेढ़ी,
कहती,आ चल खेलें लुकाछुपी!
ना वो खेत रहा ,न पगडंडी,
गिरवी रह गयी ज़मीं,
सूख गयी सारी खेती,
पेडपे चल गयी कुल्हाडी...
