एक लम्बा तनहा सफ़र...जहाँ दूर दूरतक छाया नही...मानो रेगिस्तान हो..मील के पत्थर कहाँ खोजूँ? बरसों मिला नही...यही पता नही की, कितना दूर निकल आयी हूँ..सरपे धूप रही या रातमे अँधियारा...जो राह दिखाए वो तारा कहीं नही था..युग बीते..मध्यान्य का सूरज ...परछाई पैरों तले...दिशा कैसे पता चले? कैसा भयानक दिशा भ्रम है?
कुछ तो कहीं रहगुज़र होती...कोई हमसफ़र होता...पर सब कब बिछड़ गए,कैसे बिछड़ गए? एक शोर-सा सुनायी देता था..पर उसे सुने भी अरसा हुआ..कहाँ है मंजिल मेरी...??उस धूलसे सने मीलके पत्थर के पास? जिसे मै पीछे छोड़ आयी..? लौटने के लिए राह नही...आगे,आगे चलती हूँ...पीछे छूटी सराय के दरवाज़े बंद हो जाते हैं...सराय भी कैसी? अंधेरी..बिना छतकी..दीवारों पे उल्लू और चिमगादर....बस वही ज़िंदगी का निशाँ...मै तो डरना भी भूल चुकी हूँ...ज़िंदगी के निशाँ खोज रही हूँ...गर मेरे साथ उड़े तो ये परिदे भी चलेंगे...लेकिन मेरे लिए ये क्यों अपना बसेरा छोड़ेंगे?
इन राहों पे लुटेरे भी नही,जिनपे मै चल रही हूँ...क्यों होंगे यहाँ लुटेरे जब पास कोई खजाना भी नही..दरबदर भटकता जीवन..आस के सारे पाखी उड़ गए या मैंने उड़ा दिए? खबर नही..रात कभी रेतपे सो जाती हूँ...तो सपनों में अपनी माँ दिखाई देती है...जो नही रही...सखियाँ जो कबकी साथ छोड़ कहीँ खो गयीं..माँ जो लोरी गुनगुनाती थी,वो भी सुनायी देती रहती है...काश सपने टूटे ना..मै रातों में जी लूँगी...ये हाथसे छूटे ना..
क्रमश:
sapne लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
sapne लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बुधवार, 18 नवंबर 2009
सदस्यता लें
संदेश (Atom)