न हीर हूँ,न हूर हूँ , न नूर की कोई बूँद हूँ,
ना किसी चमन की दिलकश बहार हूँ...
खिज़ा में बिछड़ी एक डाल की पत्ती हूँ...
न धड़कने हैं,न उमंगें मेरे नसीब में,
उड़ा ले जाए सबा, पहाड़ के परे,रुकी हूँ,..
पैर के नीचे खड़क जाउँगी,जान चुकी हूँ..
चौंक जायेगी कोई बिरहन इस आवाज़ से,
कुछ देर उसकी मायूसी तो हटा दूँगी,
मिल जाएँ उसे प्रीतम ,मै बिछड़ चुकी हूँ..
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शुक्रवार, 27 अगस्त 2010
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