बहारें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बहारें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

नज़रे इनायत नहीं..



पार्श्वभूमी  बनी  है , घरमे पड़े चंद रेशम के टुकड़ों से..किसी का लहंगा,तो किसी का कुर्ता..यहाँ  बने है जीवन साथी..हाथ से काता गया सूत..चंद, धागे, कुछ डोरियाँ और कढ़ाई..इसे देख एक रचना मनमे लहराई..

एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे,
आखरी बार झडे,पत्ते इस पेड़ के,
 बसंत आया नही उस पे,पलट के,
हिल हिल के करतीं हैं, डालें इशारे...
एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे..

बहारों की  नज़रे इनायत नही,
पंछीयों को इस पेड़ की ज़रुरत नही,
कोई राहगीर अब यहाँ रुकता नही,
के दरख़्त अब छाया देता नही...
बहारों की नज़रे इनायत नहीं..

शनिवार, 19 मई 2012

नज़रे इनायत नही...



पार्श्वभूमी  बनी  है , घरमे पड़े चंद रेशम के टुकड़ों से..किसी का लहंगा,तो किसी का कुर्ता..यहाँ  बने है जीवन साथी..हाथ से काता गया सूत..चंद, धागे, कुछ डोरियाँ और कढ़ाई..इसे देख एक रचना मनमे लहराई..

एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे,
आखरी बार झडे,पत्ते इस पेड़ के,
 बसंत आया नही उस पे,पलट के,
हिल हिल के करतीं हैं, डालें इशारे...
एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे..

बहारों की  नज़रे इनायत नही,
पंछीयों को इस पेड़ की ज़रुरत नही,
कोई राहगीर अब यहाँ रुकता नही,
के दरख़्त अब छाया देता नही...
बहारों की नज़रे इनायत नहीं..

रविवार, 11 दिसंबर 2011

ये मौसम सुहाने .

सिल्क की पार्श्वभूमी है इस भित्ती चित्र में.झरना बना है एक सिल्क की चोटी से जिसे मैंने कंघी से खोल दिया! रंगीन सिल्क के टुकड़ों में से छोटे छोटे पत्ते  काट के टांक दिए  हैं.दो तीन क्रोशिये की चेन भी टांक दीं हैं,बेलों की तौर पे. उर्वरित कपडे  पे कढ़ाई की है.

 सावन  के  झरने ,
बहारों के साए,
पतझड़  के  पत्ते
मिले हैं आके यहाँ पे..

हम रहे न रहें,
किया है क़ैद इन्हें
तुम्हारे लिए,
ये अब जा न पायें..

भूल जाना दर्द सारे,
जो गर मैंने दिए,
साथ रखना अपने,
ये मौसम सुहाने..

शनिवार, 26 नवंबर 2011

नज़रे इनायत नही...


पार्श्वभूमी  बनी  है , घरमे पड़े चंद रेशम के टुकड़ों से..किसी का लहंगा,तो किसी का कुर्ता..यहाँ  बने है जीवन साथी..हाथ से काता गया सूत..चंद, धागे, कुछ डोरियाँ और कढ़ाई..इसे देख एक रचना मनमे लहराई..

एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे,
आखरी बार झडे,पत्ते इस पेड़ के,
 बसंत आया नही उस पे,पलट के,
हिल हिल के करतीं हैं, डालें इशारे...
एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे..

बहारों की  नज़रे इनायत नही,
पंछीयों को इस पेड़ की ज़रुरत नही,
कोई राहगीर अब यहाँ रुकता नही,
के दरख़्त अब छाया देता नही...
बहारों की नज़रे इनायत नहीं..


शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

न हीर हूँ,न हूर हूँ...

न हीर हूँ,न हूर  हूँ , न नूर की कोई बूँद  हूँ,
ना किसी चमन की दिलकश बहार हूँ...
खिज़ा  में बिछड़ी एक डाल की पत्ती  हूँ...

न धड़कने हैं,न उमंगें मेरे नसीब में,
उड़ा ले जाए सबा, पहाड़ के परे,रुकी हूँ,..
 पैर के नीचे खड़क जाउँगी,जान चुकी हूँ..

चौंक जायेगी कोई बिरहन इस आवाज़ से,
कुछ देर उसकी मायूसी तो हटा दूँगी,
मिल जाएँ उसे प्रीतम ,मै बिछड़ चुकी हूँ..

शनिवार, 6 मार्च 2010

रुत बदल दे !

पार कर दे हर सरहद जो दिलों में ला रही दूरियाँ ,
इन्सानसे इंसान तक़सीम हो ,खुदाने कब चाहा ?
लौट के आयेंगी बहारें ,जायेगी ये खिज़ा,
रुत बदल के देख, गर, चाहती है फूलना!
मुश्किल है बड़ा,नही काम ये आसाँ,
दूर सही,जानिबे मंजिल, क़दम तो बढ़ा!