कुछ
रंगीन कपडे के टुकड़े ,कुछ धागे , और कल्पना के रंग ...इन के
मेलजोल से मैंने बनाया है यह भित्ति चित्र...जब कभी देखती हूँ,अपना गाँव
याद आ जाता है..
वो वक़्त भी कैसा था,
सुबह का सुनहरा आसमाँ,
हमेशा अपना लगता था!
तेरा हाथ हाथों में रहता,
शाम का रेशमी गुलाबी साया,
कितना पास लगता था !
रंगीन रूई से टुकड़ों में चेहरा,
खोजना एक दूजे का,
बेहद अच्छा लगता था !
आज भी सुबह आसमाँ सुनहरा,
कुछ,कुछ रंगीन होता होगा,
जिसे अकेले देखा नही जाता....
शाम का सुरमई गुलाबी साया,
लगता है कितना सूना,सूना!
रातें गुज़रती हैं,तनहा,तनहा...

वो वक़्त भी कैसा था,
सुबह का सुनहरा आसमाँ,
हमेशा अपना लगता था!
तेरा हाथ हाथों में रहता,
शाम का रेशमी गुलाबी साया,
कितना पास लगता था !
रंगीन रूई से टुकड़ों में चेहरा,
खोजना एक दूजे का,
बेहद अच्छा लगता था !
आज भी सुबह आसमाँ सुनहरा,
कुछ,कुछ रंगीन होता होगा,
जिसे अकेले देखा नही जाता....
शाम का सुरमई गुलाबी साया,
लगता है कितना सूना,सूना!
रातें गुज़रती हैं,तनहा,तनहा...

लेबल: आसमान , रातें ,साए , तन्हाई , वक़्त ,हिन्दी कविता
