सिंदूरी रंगों की छटाओं के रेशम के तुकडे, जिन से मैंने बनाई है है चित्र की पार्श्वभूमी...कुछ रंगीन रूई के तुकडे, टांकें हैं( जिस रूई से सूत बनता है), बने हुए सूत से पेड़ काढ़े हैं...रेशम के धागों से कढ़ाई भी की है...आसमान के ऊपरी हिस्से को रेशमी टिश्यु से ढँक के फिर सिल दिया है. सब से नीचे खादी का रेशमी कपड़ा सिल दिया है.वो यादें भुलाए नही भूलतीं,
तश्तरी लिए आसमान की,
सुनहरे सपने ऊषा परोसती,
जिन्हें दिन में मै बोती रहती,
लहलहाती फसल सपनों की,
उजालों में शाम के सिंदूरी,
संग सितारों के आती जो रजनी,
मै उन संग खेलती रहती,
भोर भये तक आँख मिचौली,
कभी भी थकती नही थी......
आज भी ऊषा आती तो होगी,
संग सपने लाती तो होगी,
जादुई शामों में सिंदूरी,सिंदूरी,
फसल लहलहाती तो होगी,
रैना,संग सितारों के चलती,
खेलती,मचलती तो होगी,
जा सबा! कह दे उनसे,
बुलाती है एक बिछड़ी,
सहेली उनके बचपनकी!
कह दे पहरों से तीनों,
मेरे द्ववार पे दस्तक,
हर रोज़ देते जाएँ,
फिर से लायें वो सपने,
हर भोर मुझे जगाएँ,
रह ना जाऊँ कहीँ,
मै आँखें मलती,मलती!
हर शाम आए लेके लाली,
आँगन में उतरे मेरे चाँदनी,
हो रातें अमावासकी,
हज़ारों,हज़ारों,सितारों जडी,
रहें आँखें मेरी ख़्वाबों भरी!