गुरुवार, 10 जून 2010

चलो,चाँद पे जाएँ!


कुछ हाथ करघेसे बने सिल्क के टुकड़े, थोडा घरपे काता और रंगा गया सूत और रंगीन रुई के ( sliver)टुकड़े,थोडा tissue जिसका कुछ हिस्सा रंगीन रुई के टुकड़ों पे चढ़ाया गया है....और हाथसे की कढ़ाई...इन सबसे यह भित्ती चित्र मैंने बनाया है....जो  याद  दिलाता  है ,बचपन की  सुनहरी  शामों  के  रंग .....

मेरा बचपन,एक खेत पे, बड़े प्यारे संयुक्त  परिवार के साथ बीता. मेरे लिए एक आया हुआ करती थी, जिसे मै वनु मासी कहा करती...वह एक निरक्षर औरत थी, जो मुझे नहलाती, कभी घुमाने ले जाती, कभी खाना खिलती..और कहानियाँ भी सुनाती...कहानियों में जादुई सम्मोहन हुआ करता..! बिलकुल वैसा,जैसा दादी माँ की कहानियों में होता!

मै तब स्कूल में ही थी,जब वनु मासी को अपने गाँव जाना पड़ गया. वह मुझे बेहद याद आती..शायद आज भी आती है..

इत्तेफाक़न, चंद रोज़ पूर्व, मेरी उससे मुलाक़ात हुई. बड़ा गज़ब का लम्हा था वो..हम दोनों अपने अपने  जीवन में  कई,कई मोड़ों से गुज़र चुके थे. उतार चढाओं से रु-b -रु हुए थे. दोनों एक दूसरे के गले लग खूब रो लिए..अचानक मुझे,मेरे बचपन का एक वाकया याद गया ,लगा था,जिसे मै भूल गयी! और कथा कथन के जादुई सम्मोहन को समझ  गयी...वो बचपन का वाक़या आज भी मेरे ज़हन में उतना ही ताज़ा था,जितना की,तब!

मेरी उम्र कुछ तीन चार साल की रही होगी. आम शामों की तरह वो भी एक शाम थी,जब माँ मुझे घर के अन्दर बुला रही थी,और मै और खेलना चाह रही थी. अंत में माँ का सब्र जवाब दे गया..वो तीखी आवाज़ में बोलीं-" तू अन्दर आने के लिए क्या लेगी?'

मै-" चाँद! मुझे चाँद पे जाना है,और उस बूढ़ी नानी से मिलना है!

माँ (हैरान होते हुए)-" क्या? "

मै- " वो जो सूत कतायी करती है और कपड़ा बुनती है..बादलों की रंगीन रुई से...फिर नीचे डाल देती है...और तुम उस  से मेरे कपडे सीती हो ! मुझे उसी के पास जाना है..अभी!


यह सब मुझे वनु मासी बताया करती थी! माँ निशब्द हो गयीं..! उन्हें क्या पता था यह सब?

वनु मासी माँ के छुटकारे के लिए बोल उठी-" ज़रूर जाना..मै भी चलूँगी...लेकिन उससे पहले तुम्हें नहाना होगा..वहाँ गंदे पैर लेके नही जा सकते...और भूखे पेट भी नही! नहाओ,खाओ,फिर!


मै-" ऊ..!अच्छा,अच्छा!"

मै तुरंत वह सब कुछ करने राज़ी हो गयी,जो ज़रूरी था!पर चाँद पे जानेवाली बात नही भूली..खाना ख़त्म होते ही मैंने फिर विषय छेड़ दिया-" अब ले चलो मुझे चाँद पे!"

वनु मासी-"देखो बिटिया! वहाँ जाने के लिए हमें एक सीढ़ी चाहिए..जिसका एक सिरा,एकदम 'सही' बादल पे टिकाना होगा..अब तुम्हें तो पता है,मै दिन में घर के कामों में  लग जाती हूँ..लेकिन फिर भी मै एक सीढ़ी तलाश के रखूँगी...तुम बादल तलाशना..! यह काम तो दिन में कर सकते हैं..रात में तो नही!

मै-" हाँ!हाँ! तुम मुझे जल्दी सुबह उठा देना..मै बादल ढूँढ लूँगी..ठीक?"

और इस तरह बादल की खोज शुरू हो गयी..वनु मासी की सीढ़ी देख लेने की बात तो मुझे सूझी ही नही!

वह सीढ़ी तैयार ना रखे,ऐसा तो हो ही नही सकता था!

मै आसमान में बादल खोजती रहती..कभी बादल का टुकडा बहुत छोटा होता..कभी सीढ़ी के वज़न के लिहाज़ से बहुत छितरा होता..कृष्ण  पक्ष की रातें भी हुआ करतीं..जब चाँद छोटा हो जाता..हम दोनों उस पे कैसे समाते? 

लेकिन वनुमासी कहतीं-" जितना हम रुकेंगे,उतना ज़्यादा कपड़ा तुमें मिलेगा! तुम शाम गहराने से पहले,  बादलों से अपने मन पसंद रंग चुन लिया करो और मुझे बताया करो...मै उस बुढ़िया को कहूँगी,की,तुम्हारे  मन पसंद रंगों से कपड़ा बुने! "

पता नही,ऐसे कितने दिन बीते! पर मै बिलकुल निराश नही हुई! हर गहराती शाम, इक नयी सुबह की उम्मीद लाती...जब मुझे एक 'सही' बादल का टुकडा मिल जाना था...जिस पे सीढ़ी रख,मैंने और वनु मासी ने चाँद पे जाना था...!

अपनी खोयी हुई वनु मासी को देख,उस 'बड़ी' हुई लडकी को अपने सपनों वाले बादल याद आ गए...शामों के  रंग याद आ गए..!हर रात के बाद आनेवाली उम्मीद की सुबह याद आ गयी..! क्या वह लडकी कभी वहाँ पहुँची,जहाँ जाना चाह रही थी? जिस रात की सहर नही होगी,ऐसी रात के पहले,क्या वह चाँद पे जा पायेगी???



 

26 टिप्‍पणियां:

ktheLeo ने कहा…

ख्वाहिशें, चादनी और हकीकत!
जीवन,इसका सच और हम सब.

सुन्दर कथानक और शब्द विन्यास!

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

शायद ये उसी चाँद से लगाव का फल है कि चाँद की नानी “जो सूत कतायी करती है और कपड़ा बुनती है..बादलों की रंगीन रुई से...फिर नीचे डाल देती है..”आप अपनी पोस्ट पर लगा देती हैं, रंगीनियाँ समेट कर...सचमुच नॉस्टेल्जिक...

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

interesting !

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

interesting !

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

शायद ये उसी चाँद से लगाव का फल है कि चाँद की नानी “जो सूत कतायी करती है और कपड़ा बुनती है..बादलों की रंगीन रुई से...फिर नीचे डाल देती है..”आप अपनी पोस्ट पर लगा देती हैं, रंगीनियाँ समेट कर...सचमुच नॉस्टेल्जिक. ,,,,, इस टिप्पणी से सहमत। जानदार अभिव्यक्ति।

nilesh mathur ने कहा…

मैं भी बचपन में खो गया, सचमुच बहुत ही भावनात्मक वर्णन है, बहुत सुन्दर!

संजय भास्कर ने कहा…

बात तो एकदम सटीक कही..और कैसे चित्रण कर पाते इस बात का इस अंदाज में. सही है.

संजय भास्कर ने कहा…

आज के परिपेक्ष्य में सटीक रचना

sandhyagupta ने कहा…

chand ki tarah hi sundar chitra aur bachpan ki smriti.shubkamnayen.

वन्दना ने कहा…

kyaa kahoon...........kabhi kabhi zidagi ke ye kuch lamhe hi jeene ko disha de jate hain ...........bahut hi jyada prabhavshali chitran.dil ko choo gayi.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

very nice story and i would be following it thru.

ज्योति सिंह ने कहा…

अपनी खोयी हुई वनु मासी को देख,उस 'बड़ी' हुई लडकी को अपने सपनों वाले बादल याद आ गए...शामों के रंग याद आ गए..!हर रात के बाद आनेवाली उम्मीद की सुबह याद आ गयी..! क्या वह लडकी कभी वहाँ पहुँची,जहाँ जाना चाह रही थी? जिस रात की सहर नही होगी,ऐसी रात के पहले,क्या वह चाँद पे जा पायेगी???
bahut dilchsp lagi saari baate ,bachpan masoom aur anjaan hota hai tabhi pyaara sa hota hai .umda

उम्मेद गोठवाल ने कहा…

बेहतरीन रचना..सुन्दर उपमान और प्रतीक...मन के भावों की आकर्षक अभिव्यक्ति..शुभकामनाएं।

शारदा अरोरा ने कहा…

चाँद तो सपनों की धरती सरीखा है , और ये सारी जद्दो-जहद सपनों को पाने के लिए ही तो है ...आप ने कभी सुई धागे से कभी कलम से बड़े सुन्दर से चित्र उभारें हैं ।

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

आप तो बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं. आपकी लेखनी में बांधे रखने की गजब की ताकत है. ज्यादा क्या कहूँ . shandar

शोभना चौरे ने कहा…

bhut sundar .chand badal kitno ko mukhr kar jate hai hai .chitra bhi behd khubsurat hai.

M VERMA ने कहा…

बहुत सुन्दर ... बचपन का वो चाँद ... चाँद पर जाने की जिद
वाह क्या संस्मरण है

बहुत खूब

अरुणेश मिश्र ने कहा…

अति सुन्दर ।

Apanatva ने कहा…

jadoo hai aapke hath me.......air lekhan me.............

दीपक 'मशाल' ने कहा…

गंभीर कर दिया इस प्रसंग ने... ऐ चाँद क्या-क्या है तू??? आपके बनाये भित्ति चित्र का मुरीद हो गया मैम..

विजयप्रकाश ने कहा…

बहुत बढ़िया स्मरण.

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत बढ़िया संस्मरण ...आभार

abhi ने कहा…

हमें तो बचपन की किससे पढ़ना बहुत ही पसंद है, ज्यादा क्या कहें :)

vinay ने कहा…

बचपन की मासूमियत भा गयी ।

Basanta ने कहा…

Great art! And what a beautiful narration!

देवेश प्रताप ने कहा…

बहुत अच्छा लगा पढ़ कर ...आपके बचपन और आपकी वनु मासी के बारें में जान कर ......लाजवाब प्रस्तुती .