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गुरुवार, 6 मई 2010

एक धमाका ऐसा भी....

उन दिनों हम लोग  विदर्भ में थे. मैंने सुन रखा था,की, गढ़चिरौली के आदिवासी चटाई बुनते हैं.एक गैर सरकारी संस्था को मै इस बारेमे वाकिफ़ कराना  चाह रही थी.मनमे था की, गर उन्हें lamp शेड, पेन होल्डर, टेबल mats तथा अन्य बहुत-सी चीज़ों के डिजाईन दी जाये तो उन्हें बड़े शहरों में होनेवाली प्रदर्शनियों में रखा जा सके. शायद वो लोग अपने हुनर से कुछ कमा सकें. मैंने गढ़चिरौली जानेका इरादा कर लिया. कुछ लोगों ने मुझे उन रास्तों पे होने वाले नक्सल वादी  हमलों के बारेमे आगाह किया. लेकिन मैंने ठान लिया था,तो एक जिप्सी  में निकल पडी. साथ एक बन्दूक धारी रक्षक था.
रास्तेमे हमें  जंगली भैंसों का एक झुण्ड दिखा.  ज़रा-सा रुक वहाँ की २/३ तस्वीरें खींच ली.बस उसी समय एक धमाका सुनाई दिया. हम रुके थे वहाँ से बस्ती ज़्यादा दूर नहीं थी...दिवाली करीब थी...कान पटाखों के आदि हो गए थे...धमाके की ओर गौर कियाही नहीं..

नीचे बने छोटे  -से भित्ती चित्र की वही तसवीर प्रेरणा थी. तसवीर में कोई रंग नहीं थे...बस पेड़ों के पतले पतले तने,और इत्तेफ़ाक़न देखा गया भैंसों का झुण्ड. जब उसे कपडे पे उतारने लगी तो मेरे हाथ कुछ रंग बिरंगी नेट के तुकडे लग गए. आसमाँ रंगीन हो उठा! खैर!

फिर से उस रास्ते पे चलते हैं..तसवीर खींच के हम जिप्सी में बैठे ही थे,की, उसमे लगे wireless सेट पे मेसेज आया....हमलोग तुरत लौट जाएँ..उसी रास्ते को आगे रोड mine से उडा दिया गया था. बाद में पता चला की, निशाना तो हमारी जिप्सी थी..तसवीर लेने में कुछ समय निकल गया और धमाका जिप्सी पहुँचने के पहले हो गया..कुछ दिनों बाद अलग रास्ता ,अलग वाहन और बिना बन्दूक धारी रक्षक के मैं उस बस्ती पे पहुँची ज़रूर. मेरा मक़सद भी पूरा हुआ..उसकी मुझे खुशी है....बाद में हम लोग तबादले पे वहाँ से निकल पड़े. वो काम आगे चलाया गया या नही, इस बातकी ख़बर मुझे मिल न सकी. घरमे, मेरे कमरे में लगी यह तसवीर, वैसे शायद कुछ ख़ास नही, लेकिन फिरभी उस घटना के कारण एक यादगार बन गयी.

इस घटना को मैंने बहुत काम लोगों से साझा किया..वजह, जिन २/४ बार इसका उल्लेख हुआ, मुझे बेवक़ूफ़ करार दिया गया!
'भारतीय नागरिक ' द्वारा पिछली रचना पे टिप्पणी के तौरपे, की गयी बिनती,की,इस बार मै कुछ जोश भरा लिखूँ, मैंने यह पोस्ट लिख दी...! इस घटना को कविता में लिखना मेरे बस की बात नही..! इसलिए क्षमा को क्षमा करें!