कब,कौन पूछता मरज़ी उसकी,
अग्नी से, वो क्या जलाना चाहे है,
जहाँ लगाई,दिल या दामन,जला गयी!
कुम्हार आँगन बरसी जलभरी बदरी,
थिरक,थिरक गीले मटके तोड़ गयी..
सूरज से सूखी खेती तरस गयी !
कलियों का बचपन ,फूलों की जवानी,
वक़्त की निर्मम धारा बहा गयी,
थकी, दराज़ उम्र को पीछे छोड़ गयी...
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रविवार, 2 मई 2010
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