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रविवार, 2 मई 2010

वक़्त की धारा

कब,कौन पूछता मरज़ी उसकी,
अग्नी से, वो क्या जलाना चाहे है,
जहाँ लगाई,दिल या दामन,जला गयी!

कुम्हार आँगन बरसी जलभरी बदरी,
थिरक,थिरक गीले मटके  तोड़ गयी..
सूरज से सूखी खेती तरस गयी !

कलियों का बचपन ,फूलों की  जवानी,
वक़्त की निर्मम धारा बहा गयी,
थकी, दराज़ उम्र को पीछे छोड़ गयी...

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

वो वक़्त भी कैसा था.....

कुछ  रंगीन  कपडे  के  टुकड़े ,कुछ  धागे , और  कल्पना  के  रंग ...इन के मेलजोल से मैंने  बनाया है यह भित्ति चित्र...जब कभी देखती हूँ,अपना गाँव याद आ जाता है..



वो वक़्त भी कैसा था,
सुबह का सुनहरा आसमाँ,
हमेशा अपना लगता था!

तेरा हाथ हाथों में रहता,
शाम का रेशमी गुलाबी साया,
कितना पास लगता था !

रंगीन रूई से टुकड़ों में चेहरा,
खोजना  एक दूजे का,
बेहद अच्छा लगता था !

आज भी सुबह आसमाँ सुनहरा,
कुछ,कुछ रंगीन होता होगा,
जिसे अकेले देखा नही जाता....

शाम का सुरमई गुलाबी साया,
लगता है कितना सूना,सूना!
रातें गुज़रती हैं,तनहा,तनहा...




शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

waqt

 वक़्त

हम  ना  भी  गँवाते ,
लम्हों ने गुज़रना था,
मुट्ठी में क़ैद करते,
वक़्त ने फिसलना था,
अपने पैरों को जमाते,
ज़मीं ने खिसकना था!