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बुधवार, 12 मई 2010

नज़रे इनायत नही...

पार्श्वभूमी  बनी  है , घरमे पड़े चंद रेशम के टुकड़ों से..किसी का लहंगा,तो किसी का कुर्ता..यहाँ  बने है जीवन साथी..हाथ से काता गया सूत..चंद, धागे, कुछ डोरियाँ और कढ़ाई..इसे देख एक रचना मनमे लहराई..

एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे,
आखरी बार झडे,पत्ते इस पेड़ के,
 बसंत आया नही उस पे,पलट के,
हिल हिल के करतीं हैं, डालें इशारे...
एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे..

बहारों की  नज़रे इनायत नही,
पंछीयों को इस पेड़ की ज़रुरत नही,
कोई राहगीर अब यहाँ रुकता नही,
के दरख़्त अब छाया देता नही...
बहारों की नज़रे इनायत नहीं..

( मुझ से एक सवाल कई बार किया जाता है..मेरी रचनाओं में इतना दर्द क्यों है? मै खुद को कवी तो कह नही सकती...लेकिन इस सच्चाई से मुकर भी नही सकती,की,मेरी पद्य रचनाओं में ,या तो मेरा अपना,या मेरे अतराफ़ का दर्द सिमट आता है..गद्य रचनाओं में ज़रूर हलके फुल्के लमहात सिमटे हैं..जो असली जीवन से ही चुने हुए हैं...)

सोमवार, 18 जनवरी 2010

जल उठी शमा....!

शामिले ज़िन्दगीके चरागों ने
पेशे खिदमत अँधेरा किया,
मैंने खुदको जला लिया!
रौशने राहोंके ख़ातिर ,
शाम ढलते बनके शमा!
मुझे तो उजाला न मिला,
सुना, चंद राह्गीरोंको
हौसला ज़रूर मिला....
अब सेहर होनेको है ,
ये शमा बुझनेको है,
जो रातमे जलते हैं,
वो कब सेहर देखते हैं?