
एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे,
आखरी बार झडे,पत्ते इस पेड़ के,
बसंत आया नही उस पे,पलट के,
हिल हिल के करतीं हैं, डालें इशारे...
एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे..
बहारों की नज़रे इनायत नही,
पंछीयों को इस पेड़ की ज़रुरत नही,
कोई राहगीर अब यहाँ रुकता नही,
के दरख़्त अब छाया देता नही...
बहारों की नज़रे इनायत नहीं..
( मुझ से एक सवाल कई बार किया जाता है..मेरी रचनाओं में इतना दर्द क्यों है? मै खुद को कवी तो कह नही सकती...लेकिन इस सच्चाई से मुकर भी नही सकती,की,मेरी पद्य रचनाओं में ,या तो मेरा अपना,या मेरे अतराफ़ का दर्द सिमट आता है..गद्य रचनाओं में ज़रूर हलके फुल्के लमहात सिमटे हैं..जो असली जीवन से ही चुने हुए हैं...)
23 टिप्पणियां:
रचना भी सुन्दर है और कलाकृति भी ...
शायद खिजां इस बार इतनी लंबी खिंच गयी कि दरख्तों पर पत्ते नहीं रहे ...
कढाई ...और रचना दोनों ही लाजवाब...कढाई तो बहुत ही पसंद आई....
दर्द और रचना का गहरा रिश्ता होता है !
इसे रचनात्मक रूप देती रहें !
........
चित्र-चयन की तारीफ करता हूँ .. खींचे रखा देर तक !
kya baat hai....
bahut hi bhawuk rachna...
बहारों की नज़रे इनायत नही,
पंछीयों को इस पेड़ की ज़रुरत नही,
कोई राहगीर अब यहाँ रुकता नही,
के दरख़्त अब छाया देता नही...
बहारों की नज़रे इनायत नहीं..
waah.....
दर्द और रचना का गहरा रिश्ता होता ही है । अच्छी अभिव्यक्ति है।
आपने खुद ही जबाव दे दिया कि इतना दर्द क्यों उभर आता है.. दर्द की अभिव्यक्ति पर वाह-वाह बोलना तो शायद ठीक न होगा. लेकिन कविता उत्तम है, यह अवश्य कहूंगा..
आपकी कढाई, आपकी कविता और आपका आत्मकथ्य..तीन रचनाएं एक साथ एक तीसरे की उंगली थामे खड़ी मिलीं... कढाई हर बार की तरह बेमिसाल...एकदम सजीव...कविता फिर से बेहतरीन… एक उजड़े पेड़ की व्यथा, जो कहीं न कहीं समाज के उन वृद्ध सदस्यों की व्यथा का वर्णन करता है जहाँ अब कोई बहार नहीं, कोई उनके पास ठहरना नहीं चाहता... अंत में आपका आत्मकथ्य...इसमें सिर्फ एक बात खलती है, वो है “मैं खुद को कवि तो नहीं कह सकती हूँ”… ये कहना न कहना हम पर छोड दीजिए, वैसे भी हर वो व्यक्ति कवि है जो अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त कर सकता है..हाँ यह सवाल अभी भी बना है कि जीवन के और भी रंग हैं...
कोई राहगीर अब यहाँ रुकता नही,
के दरख़्त अब छाया देता नही...
bahut kah dala aap ne to......
बहारों की नज़रे इनायत नही,
पंछीयों को इस पेड़ की ज़रुरत नही,
कोई राहगीर अब यहाँ रुकता नही,
के दरख़्त अब छाया देता नही...
बहारों की नज़रे इनायत नहीं..
रचना वही बेहतरीन होती है, जो पढ़ने वालों पर असर छोड़ जाये...इस फ़न में आप हमेशा कामयाब हैं.
रही बात दर्द की....
मेरा एक शेर है-
दर्द की खातिर है दिल और दिल की खातिर दर्द है
दर्द से खाली हुआ तो दिल कहां रह जायेगा.
आप कवि नहीं कवयित्री हैं जी।
दर्द के बिना सृजन संभव नहीं ... सुना ही होगा आपने ...
वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान
निकल कर आंखों से चुपचाप
बही होगी कविता अनजान।
आज की प्रस्तुति भी सदा की तरह ;;;; उत्तम!!!
behad gaharai se likhi hui bahut kuchh kah jaati hai aapki kavita.
poonam
आपकी कढ़ाई ......और आपकी लाजवाब रचना ..दोनों को कोई जवाब नहीं .
बहुत तकलीफ देह है , यादों के गले लग आना , हश्र होता है यही , भरमों से जिन्दगी बसर होती है । खैर आपका जवाब नहीं आह को मीठा सा नगमा देने में ।
बहुत ही सुन्दर कलाकृति और उतनी ही सुन्दर रचना……………
कुछ दरीचों में पतझड
ऐसे ठहर जाता है
जैसे कभी बहार आयी ना हो
Art and poetry both very powerful!
( मुझ से एक सवाल कई बार किया जाता है..मेरी रचनाओं में इतना दर्द क्यों है? मै खुद को कवी तो कह नही सकती...लेकिन इस सच्चाई से मुकर भी नही सकती,की,मेरी पद्य रचनाओं में ,या तो मेरा अपना,या मेरे अतराफ़ का दर्द सिमट आता है..गद्य रचनाओं में ज़रूर हलके फुल्के लमहात सिमटे हैं..जो असली जीवन से ही चुने हुए हैं...)
aapke apne bare m jo bataya usse aapko jaanne ki utsukta or baDh gayi hai .
bahut dukh hai mujhe is baat ka ki aapne do baar dastak dii or aangan soona mila ..
man ki shoonyta kai baar kalam bandh deti hai
aap aaiye is baar aapko niash nahi karunga ..ye kavita aapke liye
जान रहा हूँ.....धीरे-धीरे.........
aapki kadhayi dekh kar to dil karta hai aapse coaching lena shuru kar du..aur aaj to lagta hai ki kavitaye aur unme chhipe gadye aur chhando ko bhi aap se samajhna padega. bahut acchhi rachna.
कसमा जी आपके ब्लॉग पर आना जीवन के कई रंग को जानना होता है....जहां तक दर्द की बात है तो एक तो अपना दर्द औऱ उसपर जमाने का दर्द जब आप देख रही हैं तो रचनाओं में उतर आना स्वाभाविक है...
आपकी पिछली रचनाएं भी पढ़ी ....माताओं का एक यह रुप भी..काफी दिल को छू लेने वाली थी, पर अचरज नहीं हुआ.जब पढ़े लिखे समाज की हालात बदतर है, तो आदिवासी समाज या गरीब तबके की क्या कहेंगी..कही बार लगता है कि वे हमसे बेहतर हैं. वो तो अनपढ़ हैं..महिला ही महिला की दुश्मन कम नहीं है..बेटा आज भी राजा बेटा होता है..बेटी रानी बेटी कम ही होती है....
आदिवासी इलाके में आप गईं कुछ करना चाहा..तो आपको बाद अगर जारी रहा हो तो उसे किसी चमत्कार से कम नहीं माना जा सकता.....सारा समाज निष्क्रिय है....सरकारी विभाग या तो भयंकर रुप से भ्रष्ट है..या फिर नए विचारों और प्रेरणा के अभाव में नक्कारा हो चला है..समस्याओं के लेकर सरकारी स्तर पर भयंकर जड़ता है..जो टूटती नजर नहीं आती..दिल्ली बेहाल है तो आदिवासी इलाकों की क्या कहने, जहां प्रशासन है ही नहीं...
आप अपने संस्मरण लिखते रहिए इस ब्लॉग पर...जैसा कि मैने पहले भी कहा था आपके दूसरे ब्लॉग पर इसलिए नहीं जाता की वहां काफी दर्द और जीवन की कड़वी हकीकत बिखरी पड़ी है....जिसमें से दर्द को सहने की ताकत कम है.
ओह , दर्द ही दर्द
kuch to baat hai shayd yahi prakriti ki riit haiiiiiiii
बहारों की नज़रे इनायत नही,
पंछीयों को इस पेड़ की ज़रुरत नही,
कोई राहगीर अब यहाँ रुकता नही,
के दरख़्त अब छाया देता नही...
बहारों की नज़रे इनायत नहीं..
wahhhhhh 10/10
सादर वन्दे !
विना उद्देश्य का जीवन यही तो है ! लेकिन हम वो नहीं जो इसपर आंसू बहायें हमें तो खुश होना चाहिए कि चलो किसी ने तो अपना जीवन पूरा किया,
बहुत ही हृदयस्पर्शी रचना !
रत्नेश त्रिपाठी
शब्द दर्द को महसूस कराने में सक्षम!
प्रणाम!
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