
सुना ,दीवारों के होते हैं कान ,
काश होती आँखें और लब!
मै इनसे गुफ्तगू करती,
खामोशियाँ गूंजती हैं इतनी,
किससे बोलूँ? कोई है ही नही..
आयेंगे हम लौट के,कहनेवाले,
बरसों गुज़र गए , लौटे नही ,
जिनके लिए उम्रभर मसरूफ़ रही,
वो हैं मशगूल जीवन में अपनेही,
यहाँ से उठे डेरे,फिर बसे नही...
सजी बगिया को ,रहता है फिरभी,
इंतज़ार क़दमों की आहटों का,
पर कोई राह इधर मुडती नही ,
पंखे की खटखट,टिकटिक घड़ी की,
अब बरदाश्त मुझसे होती नही...
25 टिप्पणियां:
अकेलेपन का क्या मंजर खींचा है आपने.
आपके लफ्ज गुफ्तगू करते दिख रहे हैं.
पेंटिंग भी सुन्दर और अनूठा है.
आपने तो चार पांच साल पीछे भेज दिया मुझे जब मुझे भी प्रेम हुआ था ,,बेहतरीन ..रचना ...
सुना ,दीवारों के होते हैं कान ,
काश होती आँखें और लब!
मै इनसे गुफ्तगू करती,
खामोशियाँ गूंजती हैं इतनी,
किससे बोलूँ? कोई है ही नही..
waah kya baat kahi hai..........sach kitna mushkil hota hai aise jeena jahan koi bhi na ho sunne wala.........bahut dard bhara hai.
kabhi laut pate nahi,yun bhi jane wale...bahut hi sundar!
बहुत सुन्दर रचना!
शब्दों को बढ़िया ढंग से परोसा है!
कविता के साथ पेंटिंग और भी बढ़िया लगी..
इंतज़ार कदमों की आहट का, पर कोई राह इधर मुडती नहीं ..
बेहतरीन ..
लाजवाब प्रस्तुती
विकास पाण्डेय
www.vicharokadarpan.blogspot.com
waah ekaakipan ko ubhaar diya...
...बेहतरीन !!!
सुना ,दीवारों के होते हैं कान ,
काश होती आँखें और लब!
मै इनसे गुफ्तगू करती,
खामोशियाँ गूंजती हैं इतनी,
किससे बोलूँ? कोई है ही नही..
कमाल की कविता!! अकेलेपन का इतना सजीव चित्रण. क्या कहूं अब?
आयेंगे हम लौट के,कहनेवाले,
बरसों गुज़र गए , लौटे नही ,
जिनके लिए उम्रभर मसरूफ़ रही,
वो हैं मशगूल जीवन में अपनेही,
यहाँ से उठे डेरे,फिर बसे नही...
khub kaha
भावपूर्ण रचना ......लाजवाब .
यही तो है अकेलेपन की एनाटामी और किसी आहट के लिए आहत मन !
इस अकेलेपन से बच्चों के विरह की खुशबू आ रही है ...उदासियों के आलम का सजीव चित्रण है ये कविता ।
अकेलेपन की वेदना का साकार वर्णन... दीवारें क़ैद मालूम पड़ती हैं और
आवाजें शूल की तरह चुभती हैं..
chaliye aap se hi shuru karta hu....puri kavita sundar hai ...mujhe priy lagi ..सजी बगिया को ,रहता है फिरभी,
इंतज़ार क़दमों की आहटों का,
पर कोई राह इधर मुडती नही ,
पंखे की खटखट,टिकटिक घड़ी की,
अब बरदाश्त मुझसे होती नही... Itna saveev lakhan maine abhi tak blog par nhi pada...sach kahu to aap mujhe prarit karte ho moulik laikhan ko !!
Jai H Mangalmay HO
रचना अद्बुत लिखी है, लेकिन अगर सच में एक कवि की अपनी पीड़ा है तो थोड़ा सा दर्द मुक्त होने की आदत डालनी होगी।
हाँ, मैं अक्सर कहते कहते रुक जाता हूँ, जी, आपका नाम अगर के.शमा है तो K.Shama ऐसे लिखे,कृप्या मेरे लिए, मुझे तो वो क्षमा ही समझ आता है। अगर क्षमा है तो फिर ठीक है मैं क्षमा माँगता हूँ।
bahut hi utkrist rachna....
badhai...
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mere blog par meri nayi kavita,
हाँ मुसलमान हूँ मैं.....
jaroor aayein...
aapki pratikriya ka intzaar rahega...
regards..
http://i555.blogspot.com/
auchhi rachna hai.
पंखे की खटखट,टिकटिक घड़ी की,
अब बरदाश्त मुझसे होती नही...
behad sundr bhav aap hme gmail me add kr lijiye
shrisscet@gmail.com
Aaayenge hum laut ke wo kehne waale barso gujar gayelaute nahi ........
very touchy .......
सुना ,दीवारों के होते हैं कान ,
काश होती आँखें और लब!
मै इनसे गुफ्तगू करती,
खामोशियाँ गूंजती हैं इतनी,
किससे बोलूँ? कोई है ही नही.....AAPke shabdon me dard jhalakataa hai.aapki sabhi rachnaaye ouryahan tak ki tippani bhi itna dardanaak jaise lagta hai ki aapke jivan kaa hissa ho.god bless you. subhakaamanaaye.
खामोशियाँ गूंजती हैं इतनी,
किससे बोलूँ? कोई है ही नही..
रचना ज़्यादा अच्छी या पेंटिंग?
ये फ़ैसला आप पर ही छोड़ते हैं.
Akalepan ki tis ko sundar abhiyakti pradan karti rachna.badhai.
बेहतरीन रचना ।
bahut achhi kavita :)
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