यह भित्ती चित्र केवल कढाई से बनाया है... जब कभी इस चित्र को या डाल पे बैठे,या फिर आसमान में उड़ने वाले परिन्दोको देखती हूँ ,तो मुझे वो लोग याद आ जाते हैं,जिनके बारे में लिखने जा रही हूँ.अगले दिन हम दोनों फिर बतियाने बैठ गए.मासी की बहन ने उस डॉक्टर से बात चीत कर ली. इधर उन्हों ने अपनी बहू के सामने प्रस्ताव रखा वह संजीदा हो गयी.कुछ देर खामोश रहकर बोली: " ठीक है माजी, मै इस लड़के को मिलने के तैयार हूँ....पर मेरी भी एक शर्त है.."
मासी:" क्या शर्त है?"
बहू :" उसने मुझे आपके साथ स्वीकार करना होगा...तभी मै ब्याह के लिए राज़ी हो सकती हूँ.."
मासी :" अरे, तो मै कौन कह रही हूँ,की,मुझे भूल जाना ! मै तो मिलती रहूँगी तुझसे!"
बहू:" नही,मै आपको यहाँ अकेले छोड़ के नही जा सकती. मै जहाँ रहूँगी ,आपने मेरे साथ चलना होगा..कौन है आपका इस दुनियामे? आप चाहे इसे मेरी ज़िद समझ लें,पर मै इस निर्णय पे अटल हूँ..."
मासी बड़ी धरम संकट में पड़ गयीं. उन्हों ने लड़के को अपने घर आमंत्रित किया. लड़का समयानुसार आ भी गया. कुछ और मुलाक़ातें तय होने जा रहीं थीं की,बहू, लड़के से मुखातिब हो, बोल पडी : शायद माँ जी ने मेरी एक शर्त बताई नही.."
लड़का:" तो आप कहिये,क्या शर्त है?
बहू:" मै,मेरी इस माँ को, छोड़ नही सकती. मेरी ख़ातिर इन्हों ने एक अकेली ज़िंदगी जीने का हौसला दिखाया है. जब तक मेरे पती थे,शायद तब हमारा रिश्ता सास-बहू का रहा होगा...अब माँ -बेटी का है.."
लड़का:" मुझे क़तई ऐतराज़ नही! बल्कि आप के लिए मेरे दिल में इज्ज़त बढ़ गयी है! मुझे तो बहुत खुशी होगी,गर ये हमारे साथ रहने आयें...मेरे बेटे को एक बहुत प्यारी-सी दादी मिल जायेगी!"
मासी:" दादी भी और नानी भी..."
दास्ताँ सुनाते,सुनाते मासी की आँखें भर आयीं,बोली:" उस समय भी मै अपनी बहू का प्यार देख रो पडी थी. तब तक उस के प्यार की गहराई नही नाप पाई थी...
" दो चार बार वो दोनों मिले. एक माह के भीतर,भीतर बड़ी सादगी से विवाह संपन्न हो गया. दो माह के बाद मै उनके साथ रहने चली गयी...आखिर मेरे घर को भी समेटना था! मैंने वसीयत बना दी. मेरे बाद मेरा घर मेरी बहू को मिल जाएगा! मै तो एक बेटा,जो मेरा दामाद भी है,पाके बहुत,बहुत ख़ुश हूँ! ईश्वर ने जो छीन लिया था,सूद समेत लौटा दिया! यह बच्चा तो मेरे बिना न खाता है,न सोता है."
दास्ताँ सुन मुझे लगा जैसे मै किसी फ़रिश्ते के सान्निध हूँ..बगीचे के गेट से वो जोड़ा आते दिखाई दिया..मासी खड़ी हो गयीं,तो मैंने बढ़ के अनायास उनके पैर छू लिए..उन्हों ने मुझे गले से लगा के अपने घर आने का तहे दिल से न्योता दिया...और मै गयी भी...वहाँ पहुँच महसूस हुआ, जन्नत में भी इससे अधिक शांती न होगी.....मै तुरंत उस बच्चे की मासी बन गयी...धन्य हो गयी...
एक अजीब-सा सपना आता मुझे कभी कबार..माथे पे तपता सूरज, जो दिशा भ्रम कराता...पैरों तले तपती रेत ,तलवे जलाती रहती..कुछ दूरी पे,टीलों के पीछे,हरे,घनेरे पेड़ नज़र आते..नीली पहाडी,और उसके ऊपर मंडराते मेघ..साथ ही मृगजल..मै जितना उनके करीब जाती वो उतना ही दूर जाते..मुड़ के देखती तो पीछे नज़र आते..जब तलिए बेहद जलने लगते,सरपे धूप असह्य हो जाती तो मेरी आँख खुल जाती...पसीने से लथपथ,और ज़बरदस्त सर दर्द लिए...
सिल्क पे थोडा water color,थोड़ी कढाई .