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शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

नीले तालाब का खामोश दर्पण..


बचपनकी एक यादगार जगह! हमारे खेत में तीन कुदरती तालाब थे. अब तो खैर सभी सूख गए हैं. उनमे से एक तालाब  से मुझे कुछ ख़ास ही लगाव था. दादीमाँ और माँ बगीचे में तरह तरह के फूल पौधे  लगाती रहती और मै उन्हें लगाते  हुए देखा करती. जब मुझे कोई नही देख रहा होता तो उन्हें उखाड़ के मै मेरे पसंदीदा तालाब के किनारे ले जाती. अपने खिलौनों के औज़ारों से वहाँ गड्ढे  बनाके रोप देती.मेरी तब उम्र होगी कुछ पाँच साल की.. तालाब में से पानी निकाल नियम से उन्हें डालती रहती और ये पौधे वहाँ खूब फूलते .

लेकिन क्यारियों में से पौधे जब गायब दिखते तो माँ और दादी दोनों हैरान हो जातीं! एक बार दादीमाँ  को कहते सुना," पता नही इन पौधों को चूहे उखाड़ ले जाते हैं?"( उन्हें क्या पता था की,उनके घर में एक चुहिया है जो उखाड़ ले जाती है!!)
एक बार  दादी माँ दादा से कह रही थीं ," वो जो शीशम के पेडवाला तालाब है वहाँ girenium   और hollyhocks  खूब उग रहे हैं! आपने भी देखा ना! समझ नही आता वहाँ उनकी पौध कैसे पहुँच जाती है?"
और इसी तरह बरसों बीते. उस एक शाम के बाद मै उस तालाब के किनारे बरसों तक नही गयी और बाद में वो सूख ही गया. सूख जाने से पहले वो कुछ ऐसा-सा दिखता था,जैसा की,चित्र में दिख रहा है.
सफ़ेद सिल्क पे तालाब और आसमान जल रंगों से बना लिए. फूल पौधे कढाई कर के बनाये हैं.

आईना देख,देख,
हाय रोया मेरा मन,
शीशे ने कहा पलट के,
खो गया तेरा बचपन.
पहन के बड़ी बड़ी चप्पल,
चलते थे नन्हें,नन्हें क़दम,
जब तन पे ओढ़ा करती,
माँ दादी की पैरहन..
छूटेंगी   तेरी सखियाँ,
छूटेंगी  नैहर की गलियाँ,
छूटेंगी दादी,माँ और बहन,
छूटेगा  अब ये आँगन,
न लौटेगा मस्तीभरा सावन,
छूटेंगी ये गुड़ियाँ,
जिन्हें ढूँढेंगे तेरे दो नयन,
यादोंकी गली में रह जाएगा
नीले तालाब का खामोश दर्पण,
खोयेगी बहुत कुछ,
तब मिलेंगे तुझको साजन...

मंगलवार, 14 जून 2011

ख़्वाबों का एक आशियाना....

बचपनसे एक ऐसे ही मकान का ख्व़ाब देखा करती थी....ख़्वाब तो आज भी आता है....फूलों भरी क्यारियों से घिरा एक आशियाना दिखता है,जो मेरा होता है....नीला,नीला आसमान....छितरे,छितरे अब्र, और ठंडी खुशनुमा हवाएँ!!उन क्यारियों में मै उन्मुक्त दौडती रहती हूँ....और फिर अचानक सपना टूट जाता है!


क्यों  दिखता  है   मुझको , वो सपना?
जब न कहीं वो ख़्वाबों-सा आशियाना,
ना फूलों भरी खिलखिलाती क्यारियाँ,
ना वो रूमानी बादे सबा,ना नीला आसमाँ!
था वो सब बचपन औ'यौवन का खज़ाना,
अब कहाँ से लाऊं वो नज़ारे औ' नजराना?



सिल्क के कपडे पे पहले जल रंगों से आसमाँ और क्यारियाँ रंग लीं. मकान,पेड़ क्यारियों के फूल....ये सब कढ़ाई से बनाये हैं.





 

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

मुकम्मल जहाँ ...एक क्षणिका ...


मैंने कब मुकम्मल जहाँ माँगा?
जानती हूँ नही मिलता!
मेरी जुस्तजू ना मुमकिन नहीं !
अरे पैर रखनेको ज़मीं चाही,
माथे पर   एक टुकडा आसमाँ,
पूरी दुनिया तो नही माँगी?