परिंदे लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
परिंदे लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 30 मार्च 2014

मुल्क खामोश क्यों है?

दिलों में खुशी की कोंपल नहीं,
फिर ये मौसमे बहार क्यों है?
सूखे पड़े हैं पेड़ यहाँ,
इन्हें परिंदों का इंतज़ार क्यों है?
गुलों में शहद की बूँद तक नहीं,
इन्हें भौरों का इंतज़ार क्यों है?
दूरदूर तक दर्याये रेत है,
मुसाफिर तुझे पानी की तलाश क्यों है?
बेहरोंकी इस बेशर्म बस्तीमे ,
हिदायतों का शोर क्यों है?
कहते हैं,अमन-औ चैन का मुल्क है,
यहाँ दनादन बंदूक की आवाज़ क्यों है?
औरतको  देवी कहते हैं इस देश में,
सरेआम इसकी अस्मत  लुटती  है,
मुल्क फिर भी खामोश क्यों है?



मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

परिंदे!

लाल आंखोंवाली बुलबुल पँछी के जोड़े की ये कढ़ाई है. इनकी तसवीर देखी तो इकहरे धागे से इन्हें काढने का मोह रोक नही पाई.

कैसे होते हैं  ये परिंदे!
ना साथी के पंख छाँटते ,
ना उनकी उड़ान रोकते,
ना आसमाँ बँटते इनके,
कितना विश्वास आपसमे,
मिलके अपने  घरौंदे बनाते,
बिखर जाएँ गर तिनके,
दोष किसीपे नही मढ़ते,
फिर से घोसला बुन लेते,
बहुत संजीदा होते,ये परिंदे!

सोमवार, 4 जुलाई 2011

उड़ जा ओ परिंदे!


पँछी  तो कढाई से बना है. पत्तों के लिए सिल्क हरे रंग की छटाओं   में रंग  दिया और आकार काट के सिल दिए. घोंसला बना है,डोरियों,क्रोशिये और धागों से. पार्श्व भूमी है नीले रंग के, हाथ करघे पे बुने, रेशम की.

चल उड़ जा ओ परिंदे!
तू नीड़ नया बना ले रे ,
न आयेगा अब लौट के,
इक बार जो  फैले पंख रे,
जहाँ तूने खोली आँखें,
जहाँ तूने निगले दाने रे !


शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

परिंदे!


लाल आंखोंवाली बुलबुल पँछी के जोड़े की ये कढ़ाई है. इनकी तसवीर देखी तो इकहरे धागे से इन्हें काढने का मोह रोक नही पाई.

कैसे होते हैं  ये परिंदे!
ना साथी के पंख छाँटते ,
ना उनकी उड़ान रोकते,
ना आसमाँ बँटते इनके,
कितना विश्वास आपसमे,
मिलके अपने  घरौंदे बनाते,
बिखर जाएँ गर तिनके,
दोष किसीपे नही मढ़ते,
फिर से घोसला बुन लेते,
बहुत संजीदा होते,ये परिंदे!

सोमवार, 27 सितंबर 2010

हाय ये मुई मैच!

अक्सर ही असमंजस  में पडी रहती हूँ...कभी बिजली की बरबादी पे लिखने का मन होता है तो कभी इंसान ने पहन रखे मुखौटों पे. कभी बागवानी रिझाती है तो कभी परिंदे.
कभी नितांत अकेलापन खलता है तो कभी बचपन का घर, बुला,बुला के रुला देता है.
कभी याद आते वो कुछ पलछिन जब मैंने बने पदार्थों पे घरवालों ने यों हाथ मारा था जैसे हाथी सोंड में खाद्य पदार्थ उठा लेता है....लेने वालेकी नज़र टीवी की  ओर ...क्रिकेट का मैच  चल रहा है..परदे से कैसे नज़र हटाई जाये? तो हाथ तश्तरी की तरफ जाता है...टटोलता है,और मूह से आवाज़ निकलती है...अरे प्लेट खाली है....और आने दोना!

मै कई किस्मों की ब्रेड तथा  केक, पेस्ट्रीज आदि  घरमे बना लेती हूँ...एक दिन भरुवा ब्रेड बनाने की सूझी...अक्सर अलग,अलग फिलिंग डाल के  बनाती हूँ...उस दिन पनीर कद्दूकस किया....उसमे मस्टर्ड सॉस, बारीक कटी प्याज, हरी मिर्च,हरा धनिया, थोडा मेयोनेज़, कली मिर्च  आदि,आदि मिलाया...ब्रेड  का आटा गूंध के फूलने के लिए (डबल होने के लिए) पहले ही रख दिया था...उसे छोटे चौकोनों  में बेलना शुरू कर दिया..एक चौकोन पे पनीर,सॉस आदि का मिश्रण रखती,दूसरे चौकोन से उसे ढँक के  किनारे चिपका देती . दस पंद्रह मिनटों में वो फूल जाता...एक के बाद एक गरमा गरम ट्रे बेक होके निकल रही थीं..
जब ब्रेड का आटा फूल रहा था, उतनी देर में दो तीन किस्म के केक बेक कर डाले. केक तथा ब्रेड में जो पंद्रह मिनटों का gap था, मैंने प्याज, पालक ,पनीर और हरी मिर्च के पकौड़े पेश कर दिए. बाहर बूंदाबांदी भी हो रही थी.

पकौड़ों वाली प्लेट उठा के मैंने वहाँ स्विस रोल के तुकडे,चंद चोकलेट  केक के तुकडे और कुछ प्लेन केक के तुकडे  रख दिए...निगाहें टीवी पे टिकाया हुआ एक हाथ हाथी की सोंड की माफिक आया और प्लेट में से एक टुकड़ा उठा अपने मूह में डाल दिया...
" ओह! ये क्या? मै समझा आलूका  पकौडा है...!"
मै:" तो इस के बाद मत ले...बेक की हुई भरुआ ब्रेड  बस  दो मिनिटों में तैयार हो जायेगी..."
वो: " अरे मेरा ये मतलब नही...इसे भी रहने दो...वो भी आने दो.."
प्लेट अपनी तोंद  पे रखी हुई थी और मेरे सुपुत्र बिना स्क्रीन पेसे नज़र हटाये बोल रहे थे...उसका हाथ प्लेट पे आना,वहाँ से जो हाथ लगे उसे उठाना और मूह में डालना...बिलकुल ऐसे लग रहा था जैसे हाथी अपनी सोंड बढ़ाके मूह में ठूंस रहा  हो!

साथ पतिदेव भी मैच देखने जमे हुए थे. आसपास हो रही बात चीत से उन्हें कोई सरोकार नही था. उनका भी दाहिना हाथ बढ़ा और प्लेट में से एक टुकड़ा उठाके मूह में ले गया...
पतिदेव:" अरे! ये तुमने ब्रेड में मीठा क्यों भर दिया? वैसे बहुत स्वाद है...लेकिन ड्रिंक के साथ तो..."
मै:" उफ़! आपने केक उठाके खाया है...अपने दाहिने हात को कुछ और दाहिने मोड़ो, जो चाहते हो वो मिल जायेगा.."
फिर एकबार बिना प्लेट की तरफ नज़र उठाये वो हाथ( या सोंड) उठा और...और प्लेट की किनार पे कुछ ज़्यादाही ज़ोर से टिका..प्लेट ने उछाल खाई और  गरमा गरम,( ऊपरसे बिलकुल परफेक्ट brown और कुरकुरे हुए) ब्रेड के भरुवा  चौकोरों  ने फर्श पे पटकी खाई!
पतिदेव:" उफ़! तुम्हारी भी कमाल है! तुम प्लेट भी ठीक से नही रख सकतीं ?"
अच्छा हुआ की एक और ट्रे भरके ब्रेड के चौकोर तैयार थे!
सत्यानाश हो इन मुई matches  का!

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

मेरे घर रुकना ज़िंदगी...!

परिंदे  के बच्चे की आवाज़ सुन मै तुरंत गुसलखाने में घुस गयी. देखा एक बच्चा वहाँ दीवारों से बेतहाशा टकराए जा रहा था.उसकी साँसें फूल रही थीं.मैंने उसे हाथ में उठा लिया और खिड़की की कांच पे रख दिया.वहाँ से उसका घोंसला केवल आठ इंच की दूरी पे होगा. लेकिन बेचारा इतना डरा  हुआ था,की,उसकी समझ के परे था. वैसे भी वो शायद पहली बार घोंसले के बाहर निकला होगा.मैंने उसे अपनी हथेलियों पे उठा लिया.वो काँप रहा था. थकानसे उसकी आँखें मूँदी जा रही थीं और साँस फूल रही थी.कुछ पल मुझे लगा कहीँ ये दम ना तोड़ दे. घरमे ना जाने किस कारण एक पिंजडा  पडा था.मैंने परिंदे को उसमे रखा. रखने से पहले उसे दाना देनेकी,पानी पिलाने की बड़ी कोशिश की.बेचारे को अब तक तो मादा दाना खिलाती होगी.उसे कुछ समझ नही आ रहा था. मैंने अपनी  छत पे वो पिंजडा  लटका दिया.
अन्धेरा घिर रहा था.तभी देखा, परिंदे  का जोड़ा उस पिंजड़े के इर्द गिर्द मंडरा रहा था.उस बच्चे को उस समय छोड़ देना मुझे खतरे से खाली नही लगा. वैसे भी यक़ीन नही था,की,उस बच्चे को उसके माता-पिता वापस लेंगे या नही. और लेभी लें तो कैसे? छत पे बिल्लियाँ भी आती थी. मैंने पिंजड़े को अपने कमरे में रख दिया.उसमे दाना पानी तो डाला ही.कमरे की बिजली बंद कर दी.बेचारा खामोश,आँखें मूंदे बैठा रहा.
सुबह मैंने पिछली बालकनी में वो पिंजडा रखा.देखा तो वो जोड़ा वहाँ भी आया था. अब मुझे यक़ीन हो गया की,ये जोड़ा उस बच्चे को ले जाना चाह रहा है.मै उस पिंजड़े को उठा छत पे ले गयी.(आख़री तसवीर, जो उस शाम मुझे किसी आगंतुक ने अपने मोबाइल के कैमरे से खींच दी थी..तस्वीर धुंदली है.गौरसे देखा जाये तभी बच्चा उस में दिखता है..लग रहा था,की,काश मेरा अपना कैमरा इस वक़्त मेरे पास होता..कोई ले गया था.)
छत पे  लगे एक हुक में मैंने पिंजडा लटका दिया और उसका दरवाज़ा खोल दिया.बच्चे को अपनी माता पिता की आवाजें सुनायी दे रही थीं.वो पिंजड़े  में काफ़ी देर टकराता रहा.अंत में अचानक  खुले दरवाजेसे धम करके फर्श पे जा गिरा.मैंने दिल थाम लिया...! उसे वहाँ देखते ही मादा मेरे वहाँ रखे एक बोन्साय के पौधे के डाल पे जा बैठी. बच्चा उड़ के  उस के पास जा बैठा. मै निहाल हो गयी..(तस्वीर में वो डाल नज़र आ रही है.)
चिड़िया वहाँ से तुरंत उडी और छत की रेलिंग पे जा बैठी.( डाल के ठीक बीछ से वो रेलिंग नज़र आ रही है और वहाँ से बाहर की ओर से वो घोसला भी.) बच्चा अपनी माँ के पीछे उड़ के रेलिंग पे जा बैठा..आह! यहाँ से घोंसला दूर था और मादा उड़ के घोंसले के बाहर जा बैठी...मै डर गयी,की,कहीँ बच्चा नीचे ना जा गिरे.सातवें माले से सीधा नीचे गिर सकता था....लेकिन मादा बेहतर जानती थी... बच्चा उडा और मादा के पीछे खिड़की पे बैठा और बाद में घोंसले के अन्दर....! उसके पीछे नर भी अन्दर घुस गया.मेरी आँखों से अबतक बेसाख्ता आँसूं बहे जा रहे थे! क्या नज़ारा मुझे क़ुदरत ने दिखाया था! गर यही विडिओ ग्राफ होता तो कितनी यादगार फिल्म बन जाती! 
इस माह उस जोड़े ने तीसरी बार वहाँ अंडे दिए  और बच्चे निकाले..हर बार अंडे देने से पूर्व वो चिड़िया नए तिनके लाती है और पुराने तिनके गुसलखाने में गिरा देती है.( वन बेडरूम अपार्टमेन्ट का रेनोवेशन होता रहता है !!)गर उस चिड़िया को मै शुक्रिया कह सकती तो ना जाने कितनी बार कहती...मुझपे विश्वास करने के लिए..बार,बार अपना घरौंदा  बनाने के लिए..के उसे वहाँ इतना महफूज़  लग रहा था..अब एक और किसी अन्य परिंदे का जोड़ा घुसलखाने के अन्दर लगे पंखे पे अपना घोंसला बनाने की कोशिश में है! वो तिनका तो गुसलखाने  की खिड़की से लाती  है,लेकिन वापस उड़ ने के लिए उसे कमरे की खिड़की से जाना होता है!