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रविवार, 13 नवंबर 2011

वो घर बुलाता है...

ये fusion वाली रचना ख़ास अरविन्द मिश्रा जी के अनुरोध पे!

जब ,जब पुरानी तसवीरें,

कुछ याँदें ताज़ा करती हैं ,

हँसते ,हँसते भी मेरी

आँखें भर आती हैं!



वो गाँव निगाहोंमे बसता है

फिर सबकुछ ओझल होता है,

घर बचपन का मुझे बुलाता है,

जिसका पिछला दरवाज़ा

खालिहानोमें खुलता था ,

हमेशा खुलाही रहता था!



वो पेड़ नीमका आँगन मे,

जिसपे झूला पड़ता था!

सपनोंमे शहज़ादी आती थी ,

माँ जो कहानी सुनाती थी!



वो घर जो अब "वो घर"नही,

अब भी ख्वाबोमे आता है

बिलकुल वैसाही दिखता है,

जैसा कि, वो अब नही!



लकड़ी का चूल्हाभी दिखता है,

दिलसे धुआँसा उठता है,

चूल्हा तो ठंडा पड़ गया

सीना धीरे धीरे सुलगता है!



बरसती बदरीको मै

बंद खिड्कीसे देखती हूँ

भीगनेसे बचती हूँ

"भिगो मत"कहेनेवाले

कोयीभी मेरे पास नही

तो भीगनेभी मज़ाभी नही...



जब दिन अँधेरे होते हैं

मै रौशन दान जलाती हूँ

अँधेरेसे कतराती हूँ

पास मेरे वो गोदी नही

जहाँ मै सिर छुपा लूँ

वो हाथभी पास नही

जो बालोंपे फिरता था

डरको दूर भगाता था...



खुशबू आती है अब भी,

जब पुराने कपड़ों मे पडी

सूखी मोलश्री मिल जाती

हर सूनीसी दोपहरमे

मेरी साँसों में भर जाती,

कितना याद दिला जाती ...



नन्ही लडकी सामने आती

जिसे आरज़ू थी बडे होनेके

जब दिन छोटे लगते थे,

जब परछाई लम्बी होती थी...





बातेँ पुरानी होकेभी,

लगती हैं कल ही की

जब होठोंपे मुस्कान खिलती है

जब आँखें रिमझिम झरती हैं

जो खो गया ,ढूँढे नही मिलेगा,

बात पतेकी मुझ ही से कहती हैं ....


छोट बच्चे के नज़रिए से ये भित्ती चित्र बनाया था. खादी सिल्क की पार्श्वभूमी पे पहले थोडा पेंट कर लिया और ऊपर से कढ़ाई की है.
कभी,कभी बचपन बहुत याद आता है...सपने आते हैं,जिन में मै स्वयं को एक बच्ची देखती हूँ...बचपन वाला घर दिखता है....बचपन के दोस्त और दादा दादी दिखते हैं...आँखें खुलने पे वो बेसाख्ता बहने लगती हैं...


सोमवार, 13 दिसंबर 2010

वो घर बुलाता है...

एक छोटे बच्चे के नज़रिए से बनाया हुआ भित्ती चित्र. सिल्क के कपडे पे पार्श्वभूमी पेंट कर ली और फिर  ऊपर से कढ़ाई की है.

जब ,जब पुरानी तसवीरें,

कुछ याँदें ताज़ा करती हैं ,

हँसते ,हँसते भी मेरी

आँखें भर आती हैं!



वो गाँव निगाहोंमे बसता है

फिर सबकुछ ओझल होता है,

घर बचपन का मुझे बुलाता है,

जिसका पिछला दरवाज़ा

खालिहानोमें खुलता था ,

हमेशा खुलाही रहता था!



वो पेड़ नीमका आँगन मे,

जिसपे झूला पड़ता था!

सपनोंमे शहज़ादी आती थी ,

माँ जो कहानी सुनाती थी!



वो घर जो अब "वो घर"नही,

अब भी ख्वाबोमे आता है

बिलकुल वैसाही दिखता है,

जैसा कि, वो अब नही!



लकड़ी का चूल्हाभी दिखता है,

दिलसे धुआँसा उठता है,

चूल्हा तो ठंडा पड़ गया

सीना धीरे धीरे सुलगता है!



बरसती बदरीको मै

बंद खिड्कीसे देखती हूँ

भीगनेसे बचती हूँ

"भिगो मत"कहेनेवाले

कोयीभी मेरे पास नही

तो भीगनेभी मज़ाभी नही...



जब दिन अँधेरे होते हैं

मै रौशन दान जलाती हूँ

अँधेरेसे कतराती हूँ

पास मेरे वो गोदी नही

जहाँ मै सिर छुपा लूँ

वो हाथभी पास नही

जो बालोंपे फिरता था

डरको दूर भगाता था...



खुशबू आती है अब भी,

जब पुराने कपड़ों मे पडी

सूखी मोलश्री मिल जाती

हर सूनीसी दोपहरमे

मेरी साँसों में भर जाती,

कितना याद दिला जाती ...



नन्ही लडकी सामने आती

जिसे आरज़ू थी बडे होनेके

जब दिन छोटे लगते थे,

जब परछाई लम्बी होती थी...





बातेँ पुरानी होकेभी,

लगती हैं कल ही की

जब होठोंपे मुस्कान खिलती है

जब आँखें रिमझिम झरती हैं

जो खो गया ,ढूँढे नही मिलेगा,

बात पतेकी मुझ ही से कहती हैं ....

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

मेरे घर रुकना ज़िंदगी...!

परिंदे  के बच्चे की आवाज़ सुन मै तुरंत गुसलखाने में घुस गयी. देखा एक बच्चा वहाँ दीवारों से बेतहाशा टकराए जा रहा था.उसकी साँसें फूल रही थीं.मैंने उसे हाथ में उठा लिया और खिड़की की कांच पे रख दिया.वहाँ से उसका घोंसला केवल आठ इंच की दूरी पे होगा. लेकिन बेचारा इतना डरा  हुआ था,की,उसकी समझ के परे था. वैसे भी वो शायद पहली बार घोंसले के बाहर निकला होगा.मैंने उसे अपनी हथेलियों पे उठा लिया.वो काँप रहा था. थकानसे उसकी आँखें मूँदी जा रही थीं और साँस फूल रही थी.कुछ पल मुझे लगा कहीँ ये दम ना तोड़ दे. घरमे ना जाने किस कारण एक पिंजडा  पडा था.मैंने परिंदे को उसमे रखा. रखने से पहले उसे दाना देनेकी,पानी पिलाने की बड़ी कोशिश की.बेचारे को अब तक तो मादा दाना खिलाती होगी.उसे कुछ समझ नही आ रहा था. मैंने अपनी  छत पे वो पिंजडा  लटका दिया.
अन्धेरा घिर रहा था.तभी देखा, परिंदे  का जोड़ा उस पिंजड़े के इर्द गिर्द मंडरा रहा था.उस बच्चे को उस समय छोड़ देना मुझे खतरे से खाली नही लगा. वैसे भी यक़ीन नही था,की,उस बच्चे को उसके माता-पिता वापस लेंगे या नही. और लेभी लें तो कैसे? छत पे बिल्लियाँ भी आती थी. मैंने पिंजड़े को अपने कमरे में रख दिया.उसमे दाना पानी तो डाला ही.कमरे की बिजली बंद कर दी.बेचारा खामोश,आँखें मूंदे बैठा रहा.
सुबह मैंने पिछली बालकनी में वो पिंजडा रखा.देखा तो वो जोड़ा वहाँ भी आया था. अब मुझे यक़ीन हो गया की,ये जोड़ा उस बच्चे को ले जाना चाह रहा है.मै उस पिंजड़े को उठा छत पे ले गयी.(आख़री तसवीर, जो उस शाम मुझे किसी आगंतुक ने अपने मोबाइल के कैमरे से खींच दी थी..तस्वीर धुंदली है.गौरसे देखा जाये तभी बच्चा उस में दिखता है..लग रहा था,की,काश मेरा अपना कैमरा इस वक़्त मेरे पास होता..कोई ले गया था.)
छत पे  लगे एक हुक में मैंने पिंजडा लटका दिया और उसका दरवाज़ा खोल दिया.बच्चे को अपनी माता पिता की आवाजें सुनायी दे रही थीं.वो पिंजड़े  में काफ़ी देर टकराता रहा.अंत में अचानक  खुले दरवाजेसे धम करके फर्श पे जा गिरा.मैंने दिल थाम लिया...! उसे वहाँ देखते ही मादा मेरे वहाँ रखे एक बोन्साय के पौधे के डाल पे जा बैठी. बच्चा उड़ के  उस के पास जा बैठा. मै निहाल हो गयी..(तस्वीर में वो डाल नज़र आ रही है.)
चिड़िया वहाँ से तुरंत उडी और छत की रेलिंग पे जा बैठी.( डाल के ठीक बीछ से वो रेलिंग नज़र आ रही है और वहाँ से बाहर की ओर से वो घोसला भी.) बच्चा अपनी माँ के पीछे उड़ के रेलिंग पे जा बैठा..आह! यहाँ से घोंसला दूर था और मादा उड़ के घोंसले के बाहर जा बैठी...मै डर गयी,की,कहीँ बच्चा नीचे ना जा गिरे.सातवें माले से सीधा नीचे गिर सकता था....लेकिन मादा बेहतर जानती थी... बच्चा उडा और मादा के पीछे खिड़की पे बैठा और बाद में घोंसले के अन्दर....! उसके पीछे नर भी अन्दर घुस गया.मेरी आँखों से अबतक बेसाख्ता आँसूं बहे जा रहे थे! क्या नज़ारा मुझे क़ुदरत ने दिखाया था! गर यही विडिओ ग्राफ होता तो कितनी यादगार फिल्म बन जाती! 
इस माह उस जोड़े ने तीसरी बार वहाँ अंडे दिए  और बच्चे निकाले..हर बार अंडे देने से पूर्व वो चिड़िया नए तिनके लाती है और पुराने तिनके गुसलखाने में गिरा देती है.( वन बेडरूम अपार्टमेन्ट का रेनोवेशन होता रहता है !!)गर उस चिड़िया को मै शुक्रिया कह सकती तो ना जाने कितनी बार कहती...मुझपे विश्वास करने के लिए..बार,बार अपना घरौंदा  बनाने के लिए..के उसे वहाँ इतना महफूज़  लग रहा था..अब एक और किसी अन्य परिंदे का जोड़ा घुसलखाने के अन्दर लगे पंखे पे अपना घोंसला बनाने की कोशिश में है! वो तिनका तो गुसलखाने  की खिड़की से लाती  है,लेकिन वापस उड़ ने के लिए उसे कमरे की खिड़की से जाना होता है!