रही तलाश इक दिए की,
ता-उम्र इक शमा को,
कभी उजाले इतने तेज़ थे
की , दिए दिखायी ना दिए,
या मंज़िले जानिब अंधेरे थे,
दिए जलाये ना दिए गए.....
मै क्या कहूँ,की, मै कहाँ हूँ? मुझे खुद खबर नही...ना राह ना रहनुमा..कान पे हाथ रख लेती हूँ, की, खामोशियाँ सुनायी न दे..जिसका सब कुछ छीन गया हो, उसकी क़िस्मत क्या होगी? नह्नीं औलाद छिन गयी...जो मेरी ज़िंदगी थी..मै उसे लोरी गाके सुला नही सकती...ना अपना दूध पिला सकती..रोती नही,की, मनाये कौन..आँसू पोंछे कौन ?? मेरे सफ़र का अंत कहाँ? मेरे अंत के साथ? .. क्या मेरा अंत हो नही गया जब एक माँ को अपनी औलाद से जुदा कर दिया गया? उस दूधमुही बच्ची का क्या कुसूर?
ज़िंदगी की हर तमन्ना मर चुकी...तो मुझे कौन ज़िंदा कहेगा?? मुझे खबर नही के मेरे जिगर का टुकडा..मेरी लाडली कहाँ है..मै अपनी दुनिया उसपे वार दूँ, गर पता चले वो है कहाँ...इस देशमे या परदेसमें?? क्या वहाँ से गुज़रती हुई हवा मुझे बताएगी? क्या चाँद मेरी लोरी उसे सुनाएगा? अपनी दास्तान सुना रही हूँ,तो आँसू थामे नही थमते..
मेरी लाडली को कौन बहलाता होगा जब वो रोती होगी ?? कौन खिलाता होगा? कौन सुलाता होगा? उसकी तलाश मेरी ज़िंदगी का मक़सद है...वहीँ से शुरू वहीँ ख़त्म...मैंने ऐसा कौनसा दुष्कर्म किया होगा जिसकी मुझे सज़ा मिल रही है...?? मै अपनी हर की न की खता स्वीकार कर लूँ गर मुझे मेरी बच्ची की खबर मिले..खबर मिले की,वो सही सलामत है...ईश्वर उसे किस गुनाह की सज़ा दे रहा है? इतनी-सी जान कभी कोई खता कर सकती है,जिसकी उसे सज़ा मिल रही है?
रातों में वो मेरी बाँहों में आ जाती है...गर नींद लगती है..कभी मै अपनी माँ की बेटी बन जाती हूँ..कभी अपनी बिटिया को सीने से लगा लेती हूँ...रातों मेही जी सकती हूँ...दिन के उजाले मुझे रास नही आते..
अगली कड़ी क्या लिखूंगी? मेरी दास्ताँ का अंत मुझे खुद नही पता...इसलिए यहीं बिदा लेती हूँ..इस दुआ के साथ,की, दुनियामे जीते जी, किसी माँ की औलाद इस तरह कोई ना छीने..
समाप्त