शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

परिंदे!


लाल आंखोंवाली बुलबुल पँछी के जोड़े की ये कढ़ाई है. इनकी तसवीर देखी तो इकहरे धागे से इन्हें काढने का मोह रोक नही पाई.

कैसे होते हैं  ये परिंदे!
ना साथी के पंख छाँटते ,
ना उनकी उड़ान रोकते,
ना आसमाँ बँटते इनके,
कितना विश्वास आपसमे,
मिलके अपने  घरौंदे बनाते,
बिखर जाएँ गर तिनके,
दोष किसीपे नही मढ़ते,
फिर से घोसला बुन लेते,
बहुत संजीदा होते,ये परिंदे!

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

रहें आँखें मेरी ख़्वाबों भरी!


सिंदूरी रंगों की छटाओं के रेशम के तुकडे, जिन से मैंने बनाई है  है चित्र की पार्श्वभूमी...कुछ रंगीन रूई के तुकडे, टांकें हैं( जिस रूई से सूत  बनता  है), बने हुए सूत से पेड़ काढ़े हैं...रेशम के धागों से कढ़ाई भी की है...आसमान के ऊपरी हिस्से को रेशमी टिश्यु से ढँक के फिर सिल दिया है. सब से नीचे खादी का रेशमी कपड़ा सिल दिया है.

वो यादें भुलाए नही भूलतीं,
तश्तरी लिए आसमान की,
सुनहरे सपने ऊषा परोसती,
जिन्हें दिन में मै बोती रहती,
लहलहाती  फसल सपनों की,
उजालों में शाम के सिंदूरी,
संग सितारों के आती जो रजनी,
मै उन संग खेलती रहती,
भोर भये तक आँख मिचौली,
कभी भी  थकती नही थी......

आज भी  ऊषा आती तो होगी,
संग सपने लाती तो होगी,
जादुई शामों में सिंदूरी,सिंदूरी,
फसल लहलहाती तो होगी,
रैना,संग सितारों के चलती,
खेलती,मचलती तो होगी,
जा सबा! कह दे उनसे,
बुलाती है एक बिछड़ी,
सहेली उनके बचपनकी!
कह दे पहरों से तीनों,
मेरे द्ववार पे दस्तक,
हर रोज़ देते  जाएँ,
फिर से लायें वो सपने,
हर भोर  मुझे जगाएँ,
रह ना जाऊँ कहीँ,
मै आँखें मलती,मलती!
हर शाम आए लेके लाली,
आँगन में उतरे  मेरे चाँदनी,
हो रातें अमावासकी,
हज़ारों,हज़ारों,सितारों जडी,
रहें  आँखें मेरी ख़्वाबों भरी!

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

बस, चलते,चलते,यूँही...

बस ,ट्रेन,या कार में सफ़र करते समय आसपास लगातार निरिक्षण करना मेरी आदत -सी बन गयी है. रास्तेपे चलते हुए लोग,सब्ज़ी खरीदती  औरतें,बस पकड़ने के लिए भागते हुए लोग,रास्ता पार करते हुए लोग....और उन सब के हावभाव....बड़ा मज़ा आता है देखते रहने में!

उस दिन इसी तरह मेरी कार ट्राफिक सिग्नल पे रुकी थी. दाहिने हाथ पे चौड़ा रोड divider   था. वहाँ चंद भिखारी बच्चे आपस में मौज मस्ती कर रहे थे. एक लडकी,जो कुछ १२  या १३  साल की होगी,छोटे बच्चे को गोद में लिए, कभी रुकी हुई गाड़ियों के पास जाके भीख मांगती तो कभी अन्य भीखमंगों के साथ छीना झपटी करती .देखने में एकदम चंचल और चंट लग रही थी. एक और बात मैंने हमेशा गौर की. सभी गरीब तपके  की औरतों के बाल बडेही लम्बे और घने होते हैं! उनमे चाहे मिट्टी जमी हो, चाहे जुएँ हों! गर्दन पे बड़ा-सा जूड़ा ज़रूर बंधा होता है! खैर!


 मेरी गाडी तो चीटीं की चाल से रेंग रही थी. मुंबई में जो थी! उस लडकी के पास से  एक करीब सत्तर साल का वृद्ध, सरपे टोकरी लिए गुज़र रहा था. बड़ी,बड़ी सफ़ेद मूँछें थीं और चेहरे पे स्वाभिमान की झलक. देखने में राजस्थानी लग रहा था. इस लडकी ने उससे फल माँगने शुरू किये. उस फलवाले ने उस तरफ गौर नही किया. तब लडकी ने उसे पैसे दिखाते हुए कहा की,वो खरीदेगी. फलवाला भी चौकस था. वो फूटपाथ  पे एक ओर बने छोटे-से चबूतरे पे चढ़ गया. मै साँस रोके देख रही  थी. मुझे यक़ीन था की गर बूढा  टोकरी नीचे रखेगा तो लुट जाएगा....उसने टोकरी सरपे ही रखे,रखे, उसमे हाथ डाला और  संतेरे की एक जालीदार थैली नीचे उतारी.उस में चार संतरे थे.  उस लडकी ने तुरंत उसे झपटना चाहा. बूढा अनुभवी था और ताक़तवर भी. उसने उतनी ही चपलता से उस थैली को बचाया और वापस अपनी टोकरी में डाल दिया. एक लफ्ज़ भी नही कहा और दूसरी तरफ का रास्ता पार कर चला गया.

इससे पहले की वो चल देता,मैंने उसे बुलाना चाहा,लेकिन इतनी भीड़ और शोर में उसे ना सुनाई दिया ना दिखाई दिया....मुझे बड़ा ही अफ़सोस हुआ. मै उससे फल खरीद उन बच्चों को देना चाह रही थी. अक्सर मेरी कार में मै केले या फिर ग्लूकोज़ के बिस्कुट के छोटे,छोटे packet रखती हूँ. भीखमंगों को पैसे देने से कतराती हूँ. वजह ये की,उनका भी माफिया होता है. वो पैसे बँट जाते हैं. माँगने वाले बच्चे के हाथ में या पास में रहेंगे ऐसा नही होता. खानेकी चीज़ तो कम से कम उनके पेट में जाती है. उस वक़्त  मेरे पास कुछ नही था....अपने आप पे बड़ी कोफ़्त हुई. उस लडकी के बर्ताव से दुःख भी हुआ,की, उसे बूढ़े व्यक्ती से छीना झपटी नही करनी चाहिए थी. वो बूढा भी तो गरीब ही था. उस उम्र में भी सर पे टोकरी रख स्वाभीमान से अपनी रोज़ी कमाने की कोशिश कर रहा था. वैसे,भरे पेट नैतिकता की बातें करना और सोचना आसान होता है,ये भी जानती हूँ! मौक़ा मिलते  ही  मैंने बिस्कुट  के packet खरीद के रख लिए!

सोमवार, 27 सितंबर 2010

हाय ये मुई मैच!

अक्सर ही असमंजस  में पडी रहती हूँ...कभी बिजली की बरबादी पे लिखने का मन होता है तो कभी इंसान ने पहन रखे मुखौटों पे. कभी बागवानी रिझाती है तो कभी परिंदे.
कभी नितांत अकेलापन खलता है तो कभी बचपन का घर, बुला,बुला के रुला देता है.
कभी याद आते वो कुछ पलछिन जब मैंने बने पदार्थों पे घरवालों ने यों हाथ मारा था जैसे हाथी सोंड में खाद्य पदार्थ उठा लेता है....लेने वालेकी नज़र टीवी की  ओर ...क्रिकेट का मैच  चल रहा है..परदे से कैसे नज़र हटाई जाये? तो हाथ तश्तरी की तरफ जाता है...टटोलता है,और मूह से आवाज़ निकलती है...अरे प्लेट खाली है....और आने दोना!

मै कई किस्मों की ब्रेड तथा  केक, पेस्ट्रीज आदि  घरमे बना लेती हूँ...एक दिन भरुवा ब्रेड बनाने की सूझी...अक्सर अलग,अलग फिलिंग डाल के  बनाती हूँ...उस दिन पनीर कद्दूकस किया....उसमे मस्टर्ड सॉस, बारीक कटी प्याज, हरी मिर्च,हरा धनिया, थोडा मेयोनेज़, कली मिर्च  आदि,आदि मिलाया...ब्रेड  का आटा गूंध के फूलने के लिए (डबल होने के लिए) पहले ही रख दिया था...उसे छोटे चौकोनों  में बेलना शुरू कर दिया..एक चौकोन पे पनीर,सॉस आदि का मिश्रण रखती,दूसरे चौकोन से उसे ढँक के  किनारे चिपका देती . दस पंद्रह मिनटों में वो फूल जाता...एक के बाद एक गरमा गरम ट्रे बेक होके निकल रही थीं..
जब ब्रेड का आटा फूल रहा था, उतनी देर में दो तीन किस्म के केक बेक कर डाले. केक तथा ब्रेड में जो पंद्रह मिनटों का gap था, मैंने प्याज, पालक ,पनीर और हरी मिर्च के पकौड़े पेश कर दिए. बाहर बूंदाबांदी भी हो रही थी.

पकौड़ों वाली प्लेट उठा के मैंने वहाँ स्विस रोल के तुकडे,चंद चोकलेट  केक के तुकडे और कुछ प्लेन केक के तुकडे  रख दिए...निगाहें टीवी पे टिकाया हुआ एक हाथ हाथी की सोंड की माफिक आया और प्लेट में से एक टुकड़ा उठा अपने मूह में डाल दिया...
" ओह! ये क्या? मै समझा आलूका  पकौडा है...!"
मै:" तो इस के बाद मत ले...बेक की हुई भरुआ ब्रेड  बस  दो मिनिटों में तैयार हो जायेगी..."
वो: " अरे मेरा ये मतलब नही...इसे भी रहने दो...वो भी आने दो.."
प्लेट अपनी तोंद  पे रखी हुई थी और मेरे सुपुत्र बिना स्क्रीन पेसे नज़र हटाये बोल रहे थे...उसका हाथ प्लेट पे आना,वहाँ से जो हाथ लगे उसे उठाना और मूह में डालना...बिलकुल ऐसे लग रहा था जैसे हाथी अपनी सोंड बढ़ाके मूह में ठूंस रहा  हो!

साथ पतिदेव भी मैच देखने जमे हुए थे. आसपास हो रही बात चीत से उन्हें कोई सरोकार नही था. उनका भी दाहिना हाथ बढ़ा और प्लेट में से एक टुकड़ा उठाके मूह में ले गया...
पतिदेव:" अरे! ये तुमने ब्रेड में मीठा क्यों भर दिया? वैसे बहुत स्वाद है...लेकिन ड्रिंक के साथ तो..."
मै:" उफ़! आपने केक उठाके खाया है...अपने दाहिने हात को कुछ और दाहिने मोड़ो, जो चाहते हो वो मिल जायेगा.."
फिर एकबार बिना प्लेट की तरफ नज़र उठाये वो हाथ( या सोंड) उठा और...और प्लेट की किनार पे कुछ ज़्यादाही ज़ोर से टिका..प्लेट ने उछाल खाई और  गरमा गरम,( ऊपरसे बिलकुल परफेक्ट brown और कुरकुरे हुए) ब्रेड के भरुवा  चौकोरों  ने फर्श पे पटकी खाई!
पतिदेव:" उफ़! तुम्हारी भी कमाल है! तुम प्लेट भी ठीक से नही रख सकतीं ?"
अच्छा हुआ की एक और ट्रे भरके ब्रेड के चौकोर तैयार थे!
सत्यानाश हो इन मुई matches  का!

रविवार, 12 सितंबर 2010

एक सुबह और आयी..

कुछ किरने  परदे से झाँक गयीं,
कानों में आवाजें गूँज गयीं,
दिल से कुछ आहें निकलीं,
सड़क बोली,एक सुबह और आयी..

पलकों से सपने लेने आयी,
उजालों में गुरूर  से लूटने आयी,
खो गयी रौशनी सितारों की,
तेज़ धूप हमें होशमे लाई,

हाय! कैसी बेरहमी तेरी!
मरहम तो किया नही,
छुपे ज़ख्मों पे हँसने आयी,
उन्हें और कुरेदने आयी...

सोमवार, 6 सितंबर 2010

अरसा बीता ...

लम्हा,लम्हा जोड़ इक दिन बना,
दिन से दिन जुडा तो हफ्ता,
और फिर कभी एक माह बना,
माह जोड़,जोड़ साल बना..
समय ऐसेही बरसों बीता,
तब जाके उसे जीवन नाम दिया..
जब हमने  पीछे मुडके देखा,
कुछ ना रहा,कुछ ना दिखा..
किसे पुकारें ,कौन है अपना,
बस एक सूना-सा रास्ता दिखा...
मुझको किसने कब था थामा,
छोड़ के उसे तो अरसा बीता..
इन राहों से जो  गुज़रा,
वो राही कब वापस लौटा?

 

कुछ  कपडे  के  तुकडे ,कुछ  जल  रंग  और  कुछ  कढ़ाई .. इन्हीं के संयोजन से ये भित्ती चित्र बनाया है.




शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

न हीर हूँ,न हूर हूँ...

न हीर हूँ,न हूर  हूँ , न नूर की कोई बूँद  हूँ,
ना किसी चमन की दिलकश बहार हूँ...
खिज़ा  में बिछड़ी एक डाल की पत्ती  हूँ...

न धड़कने हैं,न उमंगें मेरे नसीब में,
उड़ा ले जाए सबा, पहाड़ के परे,रुकी हूँ,..
 पैर के नीचे खड़क जाउँगी,जान चुकी हूँ..

चौंक जायेगी कोई बिरहन इस आवाज़ से,
कुछ देर उसकी मायूसी तो हटा दूँगी,
मिल जाएँ उसे प्रीतम ,मै बिछड़ चुकी हूँ..