कुछ हाथ करघेसे बने सिल्क के टुकड़े, थोडा घरपे काता और रंगा गया सूत और रंगीन रुई के ( sliver)टुकड़े,थोडा tissue जिसका कुछ हिस्सा रंगीन रुई के टुकड़ों पे चढ़ाया गया है....और हाथसे की कढ़ाई...इन सबसे यह भित्ती चित्र मैंने बनाया है....जो याद दिलाता है ,बचपन की सुनहरी शामों के रंग .....गुरुवार, 10 जून 2010
चलो,चाँद पे जाएँ!
कुछ हाथ करघेसे बने सिल्क के टुकड़े, थोडा घरपे काता और रंगा गया सूत और रंगीन रुई के ( sliver)टुकड़े,थोडा tissue जिसका कुछ हिस्सा रंगीन रुई के टुकड़ों पे चढ़ाया गया है....और हाथसे की कढ़ाई...इन सबसे यह भित्ती चित्र मैंने बनाया है....जो याद दिलाता है ,बचपन की सुनहरी शामों के रंग .....गुरुवार, 3 जून 2010
उस पार तो लगा दे!
सिल्क पे थोडा water color,थोड़ी कढाई .अरे ओ आसमान वाले!
कब से नैय्या मेरी पडी है,
इंतज़ार में तेरे खड़ी है,
नही है खेवैय्या,ना सही,
पतवार तो दिला दे,
उस पार तो लगा दे!
बुला रहा है मुझे,
वो दूर साहिलों से,
इस पार झील के,
मेरा कोई नही है..
उस पार तो लगा दे!
शाम ढल रही है,
घिरने लगे अँधेरे,
मछली मुझे बना दे,
बिनती करूँ हूँ तुझ से,
उस पार तो लगा दे..!
सोमवार, 31 मई 2010
हाले चमन..
नुक्कड़,नुक्कड़ गधे खड़े हैं,
आगे पूजा के फूल हैं,
गलों में उनके हार हैं,
नन्हीं कलियाँ मरती हैं,
इनकी उम्र दराज़ है,
बुतों से बने बगीचे हैं,
फूल औ,परिंदे कहाँ हैं?
हरसूँ झुलसाती धूप है,
छाया का निशाँ नही है,
हाले चमन क्या होगा?
आगे पूजा के फूल हैं,
गलों में उनके हार हैं,
नन्हीं कलियाँ मरती हैं,
इनकी उम्र दराज़ है,
बुतों से बने बगीचे हैं,
फूल औ,परिंदे कहाँ हैं?
हरसूँ झुलसाती धूप है,
छाया का निशाँ नही है,
हाले चमन क्या होगा?
गुरुवार, 27 मई 2010
दादीमाँ का नैहर..
मेरी उम्र कुछ तीन चार साल की रही होगी, दादीमाँ मुझे खम्बात ले गयीं थीं. यह स्थल गुजरात में है.एक ज़माने में मशहूर और व्यस्त बन्दर गाह था. यहीं उनका नैहर था. हालाँ की,मै बहुत छोटी थी, लेकिन वह हवेली नुमा मकान और उसका परिसर मेरे दिमाग में एक तसवीर की तरह बस गया.उस हवेली का प्रवेश द्वार खूब नक्काशी दार लकड़ी और पीतल का बना हुआ था. वहाँ से अन्दर प्रवेश करतेही ,ईंट की दीवारों से घिरा हुआ एक बड़ा-सा बगीचा था. उन दीवारों में जगह,जगह गोल झरोखे बने हुए थे, जहाँ से बाहर का मंज़र दिखाई देता.
बगीचे की आखरी छोर पे बना दरवाज़ा , एक बड़े-से सहन में खुलता. यहाँ पे नीचे फर्श लगाया हुआ था. बीछ में तीन बड़े गद्दे डाले हुए झूले थे. इस सहन के तीनों ओर दो मंजिला मकान था. आगे और पीछे चौड़े बरामदेसे घिरा हुआ.
सहन के ठीक मध्य में, हवेली में प्रवेश करतेही, बहुत बड़ा दालान था. यहाँ भारतीय तरीके की बैठक सजी हुई रहती. अन्य साजों सामाँ नक्काशीदार लकड़ी और पीतल से बना हुआ था. दीवारों पे कहीं कहीं बड़े,बड़े आईने लगे थे. इस दालान के बाद और दो दालान थे. दूसरे दालान में अक्सर जो मेहमान घरमे रुकते थे, उनके साथ परिवार के लोग बाग बैठा करते.पहला दालान दिनमे आने जाने वाले मेहमानों के लिए था. तीसरे दालान में केवल परिवार के सदस्य मिल बैठते. महिलाओं के हाथ में अक्सर कुछ हुनर का काम जारी रहता.
इस हवेली से समंदर का किनारा काफ़ी पास में था. सुबह शाम मुझे वहाँ घुमाने ले जाया जाता था. उन्हीं दिनों ,वहाँ मौजूद ,पूरे परिवार की एक तसवीर खींची गयी थी.
इस बात को अरसा हो गया. वहाँ दोबारा जाने का मौक़ा मुझे नही मिला. एक दिन दादीमाँ के साथ पुरानी तस्वीरें देख रही थी,तो वह तस्वीरभी दिखी. सहसा मैंने दादीमाँ से अपने ज़ेहन में बसे उस मकान का वर्णन किया और पूछा, की, क्या वह मकान वाकई ऐसा था, जैसाकी मुझे याद था?
दादीमाँ हैरत से बोलीं:" हाँ ! बिलकुल ऐसा ही था...! मै दंग हूँ,की,इतनी बारीकियाँ तुझे याद हैं...!"
फिर बरसों गुज़रे. मेरा ब्याह हो गया...मेरे दादा जी के मृत्यु पश्च्यात दादीमाँ एकबार मेरे घर आयीं. मेरी छोटी बहन भी उसी शहर में थी. वह भी उन्हें मिलने आयी हुई थी. तब सपनों को लेके कुछ बात छिड़ी.
मैंने कहा :" पता नही, क्या बात है,लेकिन आज तलक सपनों में मै गर कोई घर देखती हूँ तो वह मेरे नैहर का ही होता है..और रसोई भी वही पुरानी लकड़ी के चूल्हे वाली...मेरे ससुरालवाले भी मुझे उसी घर में नज़र आते हैं..!"
बहन बोल पडी:" कमाल है ! यही मेरे साथ होता है..मुझे वही अपना बचपन का घर दिखता है...!"
इसपर दादीमाँ बोल उठीं:" मुझे शादी के बाद इस मकान में रहते ७२ साल गुज़र गए, पर मुझे आज भी वही खम्बात का मकान, मेरे घर की तौरसे सपनों में नज़र आता है..!"
सहज मेरे मन में ख़याल आया...लड़कियों को कहा जाता है,की, ब्याह के बाद ससुराल का घर ही तुम्हारा घर है...पर जिस मकान में पले बढ़ें, वहाँ की जड़े कितनी गहरी होती हैं, वही मकान अपना घर लगता है,सपनों में सही...!
ऊपर बना भित्ती चित्र उस खम्बात के घर का बगीचा है,जो मुझे याद रह गया..कुछ पेंटिंग, कुछ कढाई और कुछ क्रोशिया..इन सबके ताल मेल से कुछ दिनों पूर्व मैंने बनाया..काश! दादीमाँ के रहते बनाया होता!
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मंगलवार, 18 मई 2010
दीवारें बोलती नही..
खादी सिल्क से दीवारें तथा रास्ता बनाया है..क्रोशिये की बेलें हैं..और हाथसे काढ़े हैं कुछ फूल-पौधे..बगीचे मे रखा statue plaster ऑफ़ Paris से बनाया हुआ है..सुना ,दीवारों के होते हैं कान ,
काश होती आँखें और लब!
मै इनसे गुफ्तगू करती,
खामोशियाँ गूंजती हैं इतनी,
किससे बोलूँ? कोई है ही नही..
आयेंगे हम लौट के,कहनेवाले,
बरसों गुज़र गए , लौटे नही ,
जिनके लिए उम्रभर मसरूफ़ रही,
वो हैं मशगूल जीवन में अपनेही,
यहाँ से उठे डेरे,फिर बसे नही...
सजी बगिया को ,रहता है फिरभी,
इंतज़ार क़दमों की आहटों का,
पर कोई राह इधर मुडती नही ,
पंखे की खटखट,टिकटिक घड़ी की,
अब बरदाश्त मुझसे होती नही...
शनिवार, 15 मई 2010
दीवारें बोलती नही..
खादी सिल्क से दीवारें तथा रास्ता बनाया है..क्रोशिये की बेलें हैं..और हाथसे काढ़े हैं कुछ फूल-पौधे..बगीचे मे रखा statue plaster ऑफ़ Paris से बनाया हुआ है..सुना ,दीवारों के होते हैं कान ,
काश होती आँखें और लब!
मै इनसे गुफ्तगू करती,
खामोशियाँ गूंजती हैं इतनी,
किससे बोलूँ? कोई है ही नही..
आयेंगे हम लौट के,कहनेवाले,
बरसों गुज़र गए , लौटे नही ,
जिनके लिए उम्रभर मसरूफ़ रही,
वो हैं मशगूल जीवन में अपनेही,
यहाँ से उठे डेरे,फिर बसे नही...
सजी बगिया को ,रहता है फिरभी,
इंतज़ार क़दमों की आहटों का,
पर कोई राह इधर मुडती नही ,
पंखे की खटखट,टिकटिक घड़ी की,
अब बरदाश्त मुझसे होती नही...
बुधवार, 12 मई 2010
नज़रे इनायत नही...
पार्श्वभूमी बनी है , घरमे पड़े चंद रेशम के टुकड़ों से..किसी का लहंगा,तो किसी का कुर्ता..यहाँ बने है जीवन साथी..हाथ से काता गया सूत..चंद, धागे, कुछ डोरियाँ और कढ़ाई..इसे देख एक रचना मनमे लहराई..एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे,
आखरी बार झडे,पत्ते इस पेड़ के,
बसंत आया नही उस पे,पलट के,
हिल हिल के करतीं हैं, डालें इशारे...
एक ही मौसम है,बरसों यहाँ पे..
बहारों की नज़रे इनायत नही,
पंछीयों को इस पेड़ की ज़रुरत नही,
कोई राहगीर अब यहाँ रुकता नही,
के दरख़्त अब छाया देता नही...
बहारों की नज़रे इनायत नहीं..
( मुझ से एक सवाल कई बार किया जाता है..मेरी रचनाओं में इतना दर्द क्यों है? मै खुद को कवी तो कह नही सकती...लेकिन इस सच्चाई से मुकर भी नही सकती,की,मेरी पद्य रचनाओं में ,या तो मेरा अपना,या मेरे अतराफ़ का दर्द सिमट आता है..गद्य रचनाओं में ज़रूर हलके फुल्के लमहात सिमटे हैं..जो असली जीवन से ही चुने हुए हैं...)
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