ज़िन्दगी का जो अनुभव आपसे साझा करने जा रही,हूँ, कभी मेरे ज़ेहनसे मिटेगा नही..लेकिन कई बार , रात की तन्हाई में, आँख खुल जाती है,और कुछ नन्हें ,मासूम-से चेहरे मस्तिष्क में घूम जाते हैं.....दिल तिलमिला उठता है..नींद उड़ जाती है ...अपनी बेबसी इस क़दर शिद्दत से महसूस होती है, की मै बेसाख्ता उठके खड़ी हो जाती हूँ.. घरमे चक्कर काटने लगती हूँ..साँसें अपने आप सिसकियों में तब्दील हो जाती हैं..
कुछ साल पहले की घटना..महाराष्ट्र का एक जाना माना शहर, जहाँ मुझे चंद हफ्ते किसी कामसे रुकना था..एक मित्र परिवार के घर मै रुकी थी..
उन्हीं के घर एक महिला आहार तग्य से मेरा परिचय हुआ..वो उस शहर के सिविल अस्पताल में कार्यरत थी..उन दिनों कुपोषित आदिवासी बच्चे काफ़ी चर्चा में थे..अखबारों में आए दिन खबरें छपती..राज्य सरकार निशाने पे थी..कई आदिवासी बच्चे सरकारी अस्पताल में भरती होते रहते थे..इस महिला पे काम का काफ़ी भार था..बातचीत के दौरान मैंने पूछा:" क्या मेरी कुछ भी सहायता हो सकती है? मेरे पास समय तो काफ़ी है.."
उसने कहा:" ख़याल अच्छा है ! हाँ..सहायता हो सकती है..जिन,जिन wards में ऐसे बच्चे भरती किये जाते हैं,वहाँ निगरानी रखना ज़रूरी होता है..यह देखना की, बच्चों को समय से खान पान दिया जाता है या नही..कई बार खाना कुपोषित बच्चे को नहीं दिया जाता..."
मै:" क्या मतलब? कहाँ जाता है?"
महिला:" वही तो..दिन में तीन बार आहार अस्पताल की रसोइसे ward में जाता है..फिरभी कुपोषित बच्चे की हालत में सुधार नहीं होता..दो या तीन दिनों के भीतर बच्चे चलने खेलने लगने चाहियें..एक सप्ताह से ज़्यादा अस्पताल में नही रख सकते..अन्य बच्चे क़तार में होते हैं..बहुत भीड़ है..गर तुम इस बात की निगहबानी कर सको तो बहुत अच्छा होगा.."
मै:" मै तो कल सुबह ही हाज़िर हो जाउँगी...मै कुछ कर पाऊं यह मेरे लिए खुशी का अवसर होगा!"
महिला:" तो ठीक है...तुम गर सुबह ८ बजे आ जाओ तो कमसे काम उस वक़्त जो आहार दिया जाता है,उसकी निगरानी कर सकती हो...दोपहर एक बजे और शाम ७ बजे..इनको ४ बजे दूध और फल भी दिया जाता है..वो बाद में तय करते हैं.."
मै अस्पताल पहुँच गयी..आहार आया..दूध और मीठा दलिया..बच्चों के साथ उनकी माएँ थीं .. उस भरती हुए बच्चे के ठीक ठाक भाई बहन भी उस वक़्त आ गए..मेरा पहला ही दिन था..अस्पताल का कर्मचारी वर्ग भी कितनी निगरानी रख सकता? अचानक एक अजीब-सा संयोग नज़र आया..यह मेरा भ्रम था? के केवल उस दिन जितना इत्तेफ़ाक़? बिस्तर पे पडी सारी लड़कियाँ ही थीं...! और आहार के समय अन्दर घुस आने वाले लड़के ही थे ! भाई बहन नहीं..केवल भाई! इस हुजूम में लड़कों और उनकी माओं ने तक झपट लिया आहार...!
लड़कियाँ तो केवल खाने को ताक रहीं थीं...आस भरी निगाहों से..सभी को ड्रिप लगाया हुआ था..कुछ लड़कियाँ खाना देख, कमज़ोर-सी आवाज़ में रोने लगीं..बिना जकड़े हाथ से अन्न की ओर इशारे करती हुईं...! हे भगवान् ! मै यह क्या देख रही थी? पल दो पल मुझे लगा, जैसे मै गश खाके गिर पडूँगी..पैर लड़खड़ाने लगे..अपने आपको सम्हालते हुए मैंने ऊंची आवाज़ में टोकना शुरू किया....कुछेक पल ,केवल हैरत से, वहाँ थोड़ी खामोशी हुई..!
वहाँ से गुज़रते एक वार्ड बॉय को मैंने सहायता के लिए बुलाया...वो भी चकित-सा होके,मेरे करीब आया..समझ नही पाया की,मै इतनी उत्तेजित क्यों हूँ...उसके लिए तो यह रोज़ का नज़ारा था!
जब बात उसके समझमे आयी तो बोला:" अरे मैडम..आप काहे इतना परेशान हो रही हैं? अपना काम था, खाना पकड़ा देना..फिर उनके माँ बाप जाने..आप कहाँ कहाँ देखेंगी? और भी वार्ड हैं..कोरिडार में लड़कियाँ पडी हैं..यहाँ ऐसाही चलता है..आप यहाँ देख भी लेंगी तो इनके घरमे देखने जाएँगी? इनको सरकार की तरफ से आटा, दाल चावल भी मिलता है..इधर बच्चा भरती होता है तो माँ-बाप को रोज़न्दारी भी मिलती है..! यह हफ्ता दस दिन लडकी को घर ले जाते हैं..मरने को आता है तो फिर इधर भरती कर देते हैं.. मै जाता है..x-ray के लिए मरीज को ले जाना है..."
इतना सब कहते हुए उसने चंद माओं की ओर रुख किया...शायद मेरी तसल्ली के खातिर .....और जोर से हडकाया :" सुना क्या? क्या बोलती यह मैडम? चलो दूध दलिया लडकी लोग को खिलाओ..!"
एक औरत बोली:" अरे चुप कर...जा अपना काम कर..क्या कर लेगी यह मैडम..? दिन रात नजर रखेगी क्या?"
मैंने आगे बढ़के उसके सामने से दूध और दलिया छीन लिया..पलंग पे पड़ी,कमज़ोर-सी लडकी के पास मै खड़ी हो गयी...एक चम्मच उसके होटोंको लगाया..वो डर गयी थी..अपनी माँ की ओर मानो इजाज़त के लिए देखा..वो औरत अपनी बेटी को चिल्लाके कहने लगी:" अरे तेरा पेट और फूल जायेगा! ये खाएगी तो मर जायेगी.."
तब तक बच्ची को मुझपे कुछ विश्वास हुआ..उसने मूह खोला..पता नही कब इसके मुह में किसी ने कौर दिया होगा? मुह में मीठा स्वाद आतेही उसकी आँखों में हलकी-सी चमक आयी..मुझे देख हल्का-सा मुस्काई और फिर से अपना मुह खोल दिया..अबतक मैंने अपने आँसूं मुश्किल से रोक रखे थे...अब मुझे सिसकियाँ आने लगीं..मैंने अन्य लड़कियों और उनकी माताओं के तरफ नज़र घुमाई..सभी चुपचाप मरीज़ को खिलाने लगीं थी...
मै अपना काम धाम सब भूल गयी..मेरा पूरा दिन वहीँ गुज़रा..चंद पाठशालाओं से संपर्क कर मैंने कुछ स्वयं सेवक जुटाए..
तीसरे दिन मै वहाँ के ज़च्चा बच्चा वार्ड में गयी..एक और दिल को तोड़ देनेवाली घटना की साक्षी बन गयी..एक औरत को जुडवा बच्चे हुए थे...एक लड़की एक लड़का..वो औरत केवल अपने लड़के को स्तन पान करा रही थी...लडकी को अस्पताल से मिलने वाला बोतल का दूध पिलाया जा रहा था..माओं का यह रूप मैंने पहली बार देखा था..!
जिन,जिन लड़कियों को मैंने अपने हाथों से खाना खिलाया,उनके मासूम चेहरे मै उम्रभर नही भुला पाऊँगी...उनकी कहीँ कोई सुनवाई नही थी..आँखें तो मेरी इस वक़्त भी भर भर आ रहीं हैं..
शनिवार, 8 मई 2010
शुक्रवार, 7 मई 2010
ये मौसम सुहाने .
गुरुवार, 6 मई 2010
एक धमाका ऐसा भी....
उन दिनों हम लोग विदर्भ में थे. मैंने सुन रखा था,की, गढ़चिरौली के आदिवासी चटाई बुनते हैं.एक गैर सरकारी संस्था को मै इस बारेमे वाकिफ़ कराना चाह रही थी.मनमे था की, गर उन्हें lamp शेड, पेन होल्डर, टेबल mats तथा अन्य बहुत-सी चीज़ों के डिजाईन दी जाये तो उन्हें बड़े शहरों में होनेवाली प्रदर्शनियों में रखा जा सके. शायद वो लोग अपने हुनर से कुछ कमा सकें. मैंने गढ़चिरौली जानेका इरादा कर लिया. कुछ लोगों ने मुझे उन रास्तों पे होने वाले नक्सल वादी हमलों के बारेमे आगाह किया. लेकिन मैंने ठान लिया था,तो एक जिप्सी में निकल पडी. साथ एक बन्दूक धारी रक्षक था.
रास्तेमे हमें जंगली भैंसों का एक झुण्ड दिखा. ज़रा-सा रुक वहाँ की २/३ तस्वीरें खींच ली.बस उसी समय एक धमाका सुनाई दिया. हम रुके थे वहाँ से बस्ती ज़्यादा दूर नहीं थी...दिवाली करीब थी...कान पटाखों के आदि हो गए थे...धमाके की ओर गौर कियाही नहीं..
नीचे बने छोटे -से भित्ती चित्र की वही तसवीर प्रेरणा थी. तसवीर में कोई रंग नहीं थे...बस पेड़ों के पतले पतले तने,और इत्तेफ़ाक़न देखा गया भैंसों का झुण्ड. जब उसे कपडे पे उतारने लगी तो मेरे हाथ कुछ रंग बिरंगी नेट के तुकडे लग गए. आसमाँ रंगीन हो उठा! खैर!
फिर से उस रास्ते पे चलते हैं..तसवीर खींच के हम जिप्सी में बैठे ही थे,की, उसमे लगे wireless सेट पे मेसेज आया....हमलोग तुरत लौट जाएँ..उसी रास्ते को आगे रोड mine से उडा दिया गया था. बाद में पता चला की, निशाना तो हमारी जिप्सी थी..तसवीर लेने में कुछ समय निकल गया और धमाका जिप्सी पहुँचने के पहले हो गया..कुछ दिनों बाद अलग रास्ता ,अलग वाहन और बिना बन्दूक धारी रक्षक के मैं उस बस्ती पे पहुँची ज़रूर. मेरा मक़सद भी पूरा हुआ..उसकी मुझे खुशी है....बाद में हम लोग तबादले पे वहाँ से निकल पड़े. वो काम आगे चलाया गया या नही, इस बातकी ख़बर मुझे मिल न सकी. घरमे, मेरे कमरे में लगी यह तसवीर, वैसे शायद कुछ ख़ास नही, लेकिन फिरभी उस घटना के कारण एक यादगार बन गयी.
इस घटना को मैंने बहुत काम लोगों से साझा किया..वजह, जिन २/४ बार इसका उल्लेख हुआ, मुझे बेवक़ूफ़ करार दिया गया!
'भारतीय नागरिक ' द्वारा पिछली रचना पे टिप्पणी के तौरपे, की गयी बिनती,की,इस बार मै कुछ जोश भरा लिखूँ, मैंने यह पोस्ट लिख दी...! इस घटना को कविता में लिखना मेरे बस की बात नही..! इसलिए क्षमा को क्षमा करें!
रास्तेमे हमें जंगली भैंसों का एक झुण्ड दिखा. ज़रा-सा रुक वहाँ की २/३ तस्वीरें खींच ली.बस उसी समय एक धमाका सुनाई दिया. हम रुके थे वहाँ से बस्ती ज़्यादा दूर नहीं थी...दिवाली करीब थी...कान पटाखों के आदि हो गए थे...धमाके की ओर गौर कियाही नहीं..
नीचे बने छोटे -से भित्ती चित्र की वही तसवीर प्रेरणा थी. तसवीर में कोई रंग नहीं थे...बस पेड़ों के पतले पतले तने,और इत्तेफ़ाक़न देखा गया भैंसों का झुण्ड. जब उसे कपडे पे उतारने लगी तो मेरे हाथ कुछ रंग बिरंगी नेट के तुकडे लग गए. आसमाँ रंगीन हो उठा! खैर!
फिर से उस रास्ते पे चलते हैं..तसवीर खींच के हम जिप्सी में बैठे ही थे,की, उसमे लगे wireless सेट पे मेसेज आया....हमलोग तुरत लौट जाएँ..उसी रास्ते को आगे रोड mine से उडा दिया गया था. बाद में पता चला की, निशाना तो हमारी जिप्सी थी..तसवीर लेने में कुछ समय निकल गया और धमाका जिप्सी पहुँचने के पहले हो गया..कुछ दिनों बाद अलग रास्ता ,अलग वाहन और बिना बन्दूक धारी रक्षक के मैं उस बस्ती पे पहुँची ज़रूर. मेरा मक़सद भी पूरा हुआ..उसकी मुझे खुशी है....बाद में हम लोग तबादले पे वहाँ से निकल पड़े. वो काम आगे चलाया गया या नही, इस बातकी ख़बर मुझे मिल न सकी. घरमे, मेरे कमरे में लगी यह तसवीर, वैसे शायद कुछ ख़ास नही, लेकिन फिरभी उस घटना के कारण एक यादगार बन गयी.
इस घटना को मैंने बहुत काम लोगों से साझा किया..वजह, जिन २/४ बार इसका उल्लेख हुआ, मुझे बेवक़ूफ़ करार दिया गया!
'भारतीय नागरिक ' द्वारा पिछली रचना पे टिप्पणी के तौरपे, की गयी बिनती,की,इस बार मै कुछ जोश भरा लिखूँ, मैंने यह पोस्ट लिख दी...! इस घटना को कविता में लिखना मेरे बस की बात नही..! इसलिए क्षमा को क्षमा करें!
रविवार, 2 मई 2010
वक़्त की धारा
कब,कौन पूछता मरज़ी उसकी,
अग्नी से, वो क्या जलाना चाहे है,
जहाँ लगाई,दिल या दामन,जला गयी!
कुम्हार आँगन बरसी जलभरी बदरी,
थिरक,थिरक गीले मटके तोड़ गयी..
सूरज से सूखी खेती तरस गयी !
कलियों का बचपन ,फूलों की जवानी,
वक़्त की निर्मम धारा बहा गयी,
थकी, दराज़ उम्र को पीछे छोड़ गयी...
अग्नी से, वो क्या जलाना चाहे है,
जहाँ लगाई,दिल या दामन,जला गयी!
कुम्हार आँगन बरसी जलभरी बदरी,
थिरक,थिरक गीले मटके तोड़ गयी..
सूरज से सूखी खेती तरस गयी !
कलियों का बचपन ,फूलों की जवानी,
वक़्त की निर्मम धारा बहा गयी,
थकी, दराज़ उम्र को पीछे छोड़ गयी...
बुधवार, 28 अप्रैल 2010
यादों की फुलवारी में
सिल्क के टुकड़े पे water कलर से पार्श्वभूमी बना ली...बाद में कढाई..
तितली बन,अल्हड़पन,
चुपके से उड़ आता है,
यादों की फुलवारी में,
डाल,डाल पे,फूल,फूल पे,
झूम,झूम मंडराता है...
वो ठंडी,ठंडी बादे सबा,
आँगन में उतरी शामें ,
पौधों के पीछे छुपना,
आँखमिचौली रचना ...
वो शामों का गहराना,
फिर माँ का बुलाना,
किस दिन रचा आखरी खेला
कुछ याद तुम्हें भी होगा?
हाथ पकड़ मेलों में घूमना,
है याद तुम्हें वो आखरी मेला?
छोड़ा हाथ फिर ना पकड़ा?
क्यों फिर ना पकड़ा?
प्यारा अल्हड़पन छोड़ा?
लेबल:
aangan,
baade sabaa,
kavita.,
khelaa,
phulwaaree,
shaam,
Yaaden
रविवार, 25 अप्रैल 2010
इन पहाड़ों से....
इन पहाड़ों से ,श्यामली घटाएँ,
जब,जब गुफ्तगू करती हैं,
धरती पे हरियाली छाती है,
हम आँखें मूँद लेते हैं..
हम आँखें मूँद लेते हैं...
उफ़! कितना सताते हैं,
जब याद आते है,
वो दिन कुछ भूले,भूले-से,
ज़हन में छाते जाते हैं,
ज़हन में छाते जाते हैं...
जब बदरी के तुकडे मंडरा के,
ऊपर के कमरे में आते हैं,
हम सीढ़ियों पे दौड़ जाते है,
और झरोखे बंद करते हैं,
झरोखे बंद करते हैं,
आप जब सपनों में आते हैं,
भर के बाहों में,माथा चूम लेते हैं,
उस मीठे-से अहसास से,
पलकें उठा,हम जाग जाते हैं,
हम जाग जाते हैं,
बून्दनिया छत पे ताल धरती हैं,
छम,छम,रुनझुन गीत गाती हैं,
पहाडी झरने गिरते बहते हैं,
हम सर अपना तकिये में छुपाते हैं,
सर अपना तकिये में छुपाते हैं..
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
दूर अकेली चली......
दूर अकेली जाये...
कपडेके चंद टुकड़े, कुछ कढाई, कुछ डोरियाँ, और कुछ water कलर...इनसे यह भित्ति चित्र बनाया था...कुछेक साल पूर्व..
वो राह,वो सहेली...
पीछे छूट चली,
दूर अकेली चली
गुफ्तगू, वो ठिठोली,
पीछे छूट चली...
पीछे छूट चली,
दूर अकेली चली
गुफ्तगू, वो ठिठोली,
पीछे छूट चली...
किसी मोड़ पर मिली,
रात इक लम्बी अंधेरी,
रिश्तों की भीड़ उमड़ी,
पीछे छूट चली...
धुआँ पहेन चली गयी,
'शमा' एक जली हुई,
होके बेहद अकेली,
जब बनी ज़िंदगी पहेली
वो राह ,वो सहेली...
ये कारवाँ उसका नही,
कोई उसका अपना नही,
अनजान बस्ती,बूटा पत्ती,
बिछड़ गयी कबकी,
वो राह,वो सहेली...
कोई उसका अपना नही,
अनजान बस्ती,बूटा पत्ती,
बिछड़ गयी कबकी,
वो राह,वो सहेली...
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.रेशमके कपडेपे water कलर, उसके ऊपर धुंद दिखानेके लिए शिफोनका एक layer ....कुछ अन्य रंगों के तुकडे, ज़मीन, पहाड़, घान्सफूस, दिखलाते है...इन कपडों पे कढाई की गयी है...