रविवार, 22 अगस्त 2010

बूँद बूँद से सागर....

ये  रहा  मेरा  नैहर  का  मकान  जो  एक  ज़माने  में  ऐसा  दिखा  करता  था !दादा दादीमाँ की मृत्यु के पश्च्यात भाई को वास्तु के अनुसार मकान की  छेड़छाड़ करने की सूझी और वो सिमेंट का एक block बन के रह गया! बल्कि,रहने लायक  ही नही रहा और माँ पिताजी वहाँ से ज़रा अलग हटके दूसरा मकान बनाना पड़ गया! खैर! ये वास्तु मेरे दादा-दादी की स्मुतियों  के साथ इतनी अधिक जुडी थी,की,याद आती रहती है!
आज जब मुंबई जैसे कुछ महानगर छोड़,बरसात ने फिर एक बार मूह मोड़ लिया है तो दादा-दादी की कई सारी बातें  याद आ रही हैं. उन में से एक प्रमुख बात थी पानी का मितव्यय,या यूँ कहें,सही इस्तेमाल.
महमानों को दिया झूठा पानी तक फिंकता नही था.एक बाल्टी में इकट्ठा होता और पौधों को दिया जाता. लोक मज़ाक उड़ाते लेकिन दादा कहते,"आपलोग जब छूके पानी फेंक देते हैं,तो लगता है,मानो किसी का खून फिंक रहा है!"
तबतक पर्यावरण वाद ये शब्द किसी ने सुना नही था.
जब कभी इलाके में  क़हत पड़ता तो गाँव के लोग हमारे कूए का रूख कर लेते.पास के शहर के लोग भी स्नानादि के लिए हमारे घर ही आते.उनके कपडे भी वहीँ धुलते. किसी किस्म का पानी कभी फेंकने नही दिया जाता.वो बड़े ड्रम्स में जमा होता और सफाई के लिए इस्तेमाल होता या  पेड़-पौधे  आदि को दिया जाता.बैल भैंस  को भी उसी पानी से धोया जाता.  बर्तन धुलके बचा पानी साग सब्ज़ी की क्यारियों  में पड़ता. हम सभी टब में खड़े हो नहाते.वो पानी गुसल खानों तथा बरामदों की सफाई के लिए इस्तेमाल होता. साबुन का पानी शाम में मजदूरों  के पैर धोने के लिए इस्तेमाल में आता. कहने का मतलब ये की पानी कभी भी किसी भी हाल में बहाया नही जाता.
क़हत में जब गाँव के लोग कुए से पानी लेने आते तो उनके साथ,आता,दूध,फल आदि बाँध के साथ दिया जाता. उनके जानवरों के लिए घर पे एक ख़ास मिकदार में घांस काट के रखी जाती जो उनके साथ दी जाती. मज़ेकी और दुःख की बात यह,की,यही लोग रात में अपने जानवरों को हमारे खेतों में चरने के लिए छोड़ देते!
ये सभी आदतें क़ुदरत की नैमत,जिसे पानी कहते हैं(और जीवन भी) बचाके इस्तेमाल करने की बेहतरीन सीख थी ! पानी जब इफरात से होता तब भी यही नियम जारी रहता. दादा पानी को देशका खून कहते.
लेकिन मेरे ब्याह के बाद इन्हीं बातों को लेके मुझे सब से अधिक परेशानी उठानी पडी !पानी संभाल के इस्तेमाल करना हमारे अपने लिए कितना ज़रूरी है ये बात मेरे परिवार को समझाना बेहद कठिन रहा!
आज जब कभी पानी की बहुत किल्लत होती है तो मै अपनी कामवाली बाई को गुसलखाने धोने से मना कर देती हूँ,जिन्हें  मै स्वयं साफ़ करती हूँ.वही बात बर्तनों की. उसे सिखाना बहुत मुश्किल की,पानी बेदर्दी से ना बहाए! खुद कर लेना अधिक आसान!
पिछले कुछ दिनों पूर्व मुझसे किसी ने कहा,"एक तुम बचत  कर लोगी तो क्या होगा?"
तो भाई  बूँद बूँद से ही तो सागर  बनता है! और क्या कहूँ? जिन लोगों को पानी की किल्लत की सब से अधिक दिक्कत उठानी पड़ती है,मै देखती हूँ,वही लोग सब से अधिक बेदर्दी से पानी बरबाद करते हैं! नलकों में पूरी ज़ोर से बहते पानी की आवाज़ मुझे ऐसी लगती है,मानो कोई मृत्यु शय्या पे  पडा हो और जीते जी उसका खून  बह रहा हो!

21 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

नलकों में पूरी ज़ोर से बहते पानी की आवाज़ मुझे ऐसी लगती है,मानो कोई मृत्यु शय्या पे पडा हो और जीते जी उसका खून बह रहा हो!'

पानी के प्रति यह भावना वाकई जरूरत तो इसी की है ...

M VERMA ने कहा…

नलकों में पूरी ज़ोर से बहते पानी की आवाज़ मुझे ऐसी लगती है,मानो कोई मृत्यु शय्या पे पडा हो और जीते जी उसका खून बह रहा हो!'

पानी के प्रति यह भावना वाकई जरूरत तो इसी की है ...

संजय भास्कर ने कहा…

बेहद ही खुबसूरत है

वन्दना ने कहा…

sach boond boondh ka kya mahattva hai tumne bahut achche se samjhaya.

अजय कुमार ने कहा…

सुंदर संस्मरण के माध्यम से पानी की महत्ता आपने बताई । दरअसल हमारे बुजुर्ग अपने आचरण से ही समझा देते थे ।

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

आज आपने जो बड़ों की सीख बताई, उसे सुनकर आँखें खुल गईं. पानी का ख़र्च समझदारी से करना मैं भी सिखाता हूँ बच्चों को, लेकिन यह सोचना कि पानी देश का ख़ून है और उसे व्यर्थ बहाना एक हिंसक प्रवृति है, सुनकर लगा कि इतने साधु विचार वाले व्यक्ति कितने महान होंगे. उनके चरणों में मेरा सिर नत है, क्षमा जी!
यह सच है कि बूँद बूँद से घट भरता है, लेकिन यह उससे भी बड़ा सच है कि बूँद बूँद से घट ख़ाली भी हो जाता है. आवश्यकता इस बात को समझने की है.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

सुन्दर और प्रभावशाली लेखन.
रक्षाबंधन के पुनीत पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं.

मनोज कुमार ने कहा…

जागरूक करती रचना।

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

आपकी ये रचना मैं चाहती हू हर एक ब्लोग्गर पढ़े और जितना हो सके लोग इसे पढ़ कर जागृत हों. जानते सुनते सभी हैं लेकिन करना कोई नहीं चाहता. सच कहा आपने बूँद बूँद से ही सागर भरता है. सब लोग इतनी किल्लत में हैं पानी की कमी की वजेह से फिर भी पानी की बचत करने की बात गाँठ बांधना नहीं चाहते.

शुक्रिया इस लेख के लिए.

Shekhar Suman ने कहा…

bAHUT hi khubsurat sansmaran...
bahut hi khubsurat rachna.....

mere blog par is baar..
पगली है बदली....
http://i555.blogspot.com/

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

बहुत अच्छा लेख. काश हम सभी जल के महत्व को समझ पाते.

ajit gupta ने कहा…

राजस्‍थान में तो पानी के लिए ऐसी ही भावना रहती है। जरा सा भी बर्बाद होने पर मन दुखी होता है। अच्‍छा प्रेरक लेखन, आभार।

Udan Tashtari ने कहा…

संस्मरण के माध्यम से महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रकाश डाला है, बधाई.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत प्रेरक प्रसंग ...हर एक को पानी बचाने के लिए प्रयास करने चाहिए ...

राजेश उत्‍साही ने कहा…

सच है पहले हम कहते थे पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं। लेकिन अब कहना पड़ेगा पैसे की तरह पानी बहाओ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपलोग जब छूके पानी फेंक देते हैं,तो लगता है,मानो किसी का खून फिंक रहा है!"..

यदि हर कोई ऐसा सोचे तो ये समस्या कुछ हद तक हाल हो सकती है ....

Babli ने कहा…

रक्षाबंधन पर हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
बहुत ही ख़ूबसूरत और शानदार आलेख लिखा है आपने!
अब आप मेरी नयी पोस्ट देख सकते हैं दोनों ब्लॉग पर!

dipayan ने कहा…

सच है, अगर हम बुज़ुर्गो की बातो को एहमियत दे, तो शायद कई मुश्किले आसान हो जाये । पानी, जिसका महत्व कई लोग समझ नही पाते, आपका लेख पढ़कर जान जायेंगे, ऐसा उम्मीद है ।

शोभना चौरे ने कहा…

jin cheejo ki ham kadra nahi karte aane vale samy me vo bhi sath chod dete hai
bahut prerk prasng
abhar

निर्झर'नीर ने कहा…

aap ki soch vandniiy hai or aapka priyas sarahniiy .
kashhhhhhhhhhhhh ...ki hoti khabar
humne kise bahaya hai ...pani nahi jeevan hai ye ....................

Apanatva ने कहा…

ye lagta hai post meree soch aur aadato ka saya hai.

aur ha message mila... mai abhee bhee London hee hoo.
little one (my granddaughter is taking all of my time.)
thats the only reason I am not regular .
I hope you understand .
jab samay milta hai pad letee hoo par use liye comment likhana sambhav nahee .
with best wishes .