गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

पलक भी ना झपकी

जिस रात की,चाहते थे, सेहर ही  ना हो,
पलक भी ना झपकी ,बसर हो गयी! 

उस  की पैरहन पे सितारे जड़े थे,
नज़र कैसे  उतारते ,सुबह हो गयी!

झूम के खिली थी रात की रानी,
साँस भी ना ली ,खुशबू फना  हो गयी...

जुगनू ही जुगनू,क्या नज़ारे थे,तभी,
निकल  आया  सूरज,यामिनी छल   गयी!

13 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जुगुनुओं के लोकतन्त्र को छल सूरज का राज्य आ गया।

संध्या शर्मा ने कहा…

यामिनी का छल ही तो लाता है आशाओं का सिन्दूरी उजाला … बहुत सुन्दर रचना … शुभकामनायें

Rakesh Kaushik ने कहा…

बहुत खूब
........बरस हो गई

arvind mishra ने कहा…

बीती ताहि बिसार दे ....बीती विभावरी जाग री ......

arvind mishra ने कहा…

बीती ताहि बिसार दे ....बीती विभावरी जाग री ......

Rachana ने कहा…

झूम के खिली थी रात की रानी,
साँस भी ना ली ,खुशबू फना हो गयी...
bahut hi sunder bhav
Rachana

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

समय कहां कि‍सी की प्रतीक्षा करता है

शारदा अरोरा ने कहा…

sundar likha hai ....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मन कियो कहां हो पाती है ... पलक झपकते ही रात बीत जाती है ... भावपूर्ण रचना ...

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

बेहद प्रभावी ......

Saras ने कहा…

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति

tbsingh ने कहा…

sunder prastuti. mere blog par aapka swagat hai.

tbsingh ने कहा…

sunder prastuti. mere bhi blog par aapka swagat hai.