मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

बस, चलते,चलते,यूँही...

बस ,ट्रेन,या कार में सफ़र करते समय आसपास लगातार निरिक्षण करना मेरी आदत -सी बन गयी है. रास्तेपे चलते हुए लोग,सब्ज़ी खरीदती  औरतें,बस पकड़ने के लिए भागते हुए लोग,रास्ता पार करते हुए लोग....और उन सब के हावभाव....बड़ा मज़ा आता है देखते रहने में!

उस दिन इसी तरह मेरी कार ट्राफिक सिग्नल पे रुकी थी. दाहिने हाथ पे चौड़ा रोड divider   था. वहाँ चंद भिखारी बच्चे आपस में मौज मस्ती कर रहे थे. एक लडकी,जो कुछ १२  या १३  साल की होगी,छोटे बच्चे को गोद में लिए, कभी रुकी हुई गाड़ियों के पास जाके भीख मांगती तो कभी अन्य भीखमंगों के साथ छीना झपटी करती .देखने में एकदम चंचल और चंट लग रही थी. एक और बात मैंने हमेशा गौर की. सभी गरीब तपके  की औरतों के बाल बडेही लम्बे और घने होते हैं! उनमे चाहे मिट्टी जमी हो, चाहे जुएँ हों! गर्दन पे बड़ा-सा जूड़ा ज़रूर बंधा होता है! खैर!


 मेरी गाडी तो चीटीं की चाल से रेंग रही थी. मुंबई में जो थी! उस लडकी के पास से  एक करीब सत्तर साल का वृद्ध, सरपे टोकरी लिए गुज़र रहा था. बड़ी,बड़ी सफ़ेद मूँछें थीं और चेहरे पे स्वाभिमान की झलक. देखने में राजस्थानी लग रहा था. इस लडकी ने उससे फल माँगने शुरू किये. उस फलवाले ने उस तरफ गौर नही किया. तब लडकी ने उसे पैसे दिखाते हुए कहा की,वो खरीदेगी. फलवाला भी चौकस था. वो फूटपाथ  पे एक ओर बने छोटे-से चबूतरे पे चढ़ गया. मै साँस रोके देख रही  थी. मुझे यक़ीन था की गर बूढा  टोकरी नीचे रखेगा तो लुट जाएगा....उसने टोकरी सरपे ही रखे,रखे, उसमे हाथ डाला और  संतेरे की एक जालीदार थैली नीचे उतारी.उस में चार संतरे थे.  उस लडकी ने तुरंत उसे झपटना चाहा. बूढा अनुभवी था और ताक़तवर भी. उसने उतनी ही चपलता से उस थैली को बचाया और वापस अपनी टोकरी में डाल दिया. एक लफ्ज़ भी नही कहा और दूसरी तरफ का रास्ता पार कर चला गया.

इससे पहले की वो चल देता,मैंने उसे बुलाना चाहा,लेकिन इतनी भीड़ और शोर में उसे ना सुनाई दिया ना दिखाई दिया....मुझे बड़ा ही अफ़सोस हुआ. मै उससे फल खरीद उन बच्चों को देना चाह रही थी. अक्सर मेरी कार में मै केले या फिर ग्लूकोज़ के बिस्कुट के छोटे,छोटे packet रखती हूँ. भीखमंगों को पैसे देने से कतराती हूँ. वजह ये की,उनका भी माफिया होता है. वो पैसे बँट जाते हैं. माँगने वाले बच्चे के हाथ में या पास में रहेंगे ऐसा नही होता. खानेकी चीज़ तो कम से कम उनके पेट में जाती है. उस वक़्त  मेरे पास कुछ नही था....अपने आप पे बड़ी कोफ़्त हुई. उस लडकी के बर्ताव से दुःख भी हुआ,की, उसे बूढ़े व्यक्ती से छीना झपटी नही करनी चाहिए थी. वो बूढा भी तो गरीब ही था. उस उम्र में भी सर पे टोकरी रख स्वाभीमान से अपनी रोज़ी कमाने की कोशिश कर रहा था. वैसे,भरे पेट नैतिकता की बातें करना और सोचना आसान होता है,ये भी जानती हूँ! मौक़ा मिलते  ही  मैंने बिस्कुट  के packet खरीद के रख लिए!

27 टिप्‍पणियां:

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर सोच और उसकी सही अभिव्यक्ति...आभार..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यूँ ही चलते चलते अच्छी सीख देती पोस्ट ...

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

आपकी सोच बड़ा ही सुन्दर है ... पर अफ़सोस दुनिया उतनी सुन्दर नहीं है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सूक्ष्म दृष्टि से अनुभव किया है आपने उस लड़की के व्यवहार को .... और बहुत ही सार्थक विषय भी उठाया है ....
सामाजिक बदलाव ही ऐसी चीज़ों को ठीक कर सकता है ...

वन्दना ने कहा…

बिल्कुल सही सोच है और ऐसा ही करना चाहिये पैसे देने से बेहतर है खाने को दिया जाये।

shikha varshney ने कहा…

बिलकुल सच कहा है आपने वाकई यही सब मैंने भी महसूस किया है .इन भीख मांगते बच्चों को कुछ काम करने को कहो तो तुरंत गायब हो जाते हैं वहां से.
बेहतरीन अभिव्यक्ति.

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीय क्षमा जी
नमस्कार !
.....सुन्दर सोच और प्रभावशाली लेखन.

ktheLeo ने कहा…

यकीन्न सराहनीय लेख और आपकी सोच!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

यो भूखे लोगों की जिंदा रहने की जंग है...न चोरी ना चालाकी।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

बिस्किट का तरीका अच्छा है.

Shekhar Suman ने कहा…

सोचने पर मजबूर करता आपका यह नज़रिया...बहुत ही प्रभावशाली लेखन..

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

आदत.
ज़रूरत..
हिम्मत...
और इन सबको अनुभव करते हुए...
उनके लिए कुछ करने की चाहत...
सब कुछ तो है आपकी पोस्ट में.

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

मेरी पत्नी ऐसी लड़कियों से एक सवाल पूछती हैं कि काम करोगी घर पर, मैं खाना, कपड़ा, पैसा, रहने की जगह सब दूँगी और पढाउँगी भी... तुम्हारे हाथ पैर सलामत हैं, मिहनत क्यों नहीं करती!..वो लड़की भाग जाती है और मैं हमेशा हँसकर यही कहता हूम कि वो भीख माँग रही है, सलाह नहीं. मैं भीख देने के सख़्त ख़िलाफ हूँ.. इतनी तसल्ली है कि इस व्यापार में मेरा योगदान नहीं!!

Apanatva ने कहा…

kshama hum douno hee alag alag shahro me rahte hai par soch ekdum ek....
badee acchee post
Aabhar.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

salil ji ki tarah maine bhi ek bheekh maangne wali se kaha kaam karogi mere ghar par. mehnat karo sab kuchh milega.mere ghar ki saaf safayi, bartan karna. vo meri baat sun gussa kar mujhe hi 2 baat suna gayi...arey paisa dena ho to do. me kisi ki jhoothan kyu saaf karu ? ab bataiye aise bhikhari bhi ghoomte hain.pait bhare hain, mehnat karna nahi chaahte aur sirf bina mehnat kiye bheekh maang kar shortcut se paisa paa lena chaahte hain.

aise logo ke bare me kya socha jaye aur yahi soch kar mera dil nahi karta ki inki paisa de kar madad ki jaye. lekin aapki baat me dam hai. chhote baccho ko paise ki bajay kuchh khane ka saman diya jaye jo atleast inke pait me to jayega.

sunder lekh. aajkal hamri sadak par bhi ghoom jao apni gadi le kar.

M VERMA ने कहा…

सामाजिक सरोकार युक्त सफर यूँ ही जारी रहे.

Udan Tashtari ने कहा…

यही सही तरीका है..बढ़िया सोच.

रानीविशाल ने कहा…

आपसे पूरी तरह सहमत हूँ .....कई बार देखा और महसूस किया है
बिना म्हणत के दान धर्म के नाम पर भीख देने की लोगो की आदत ने इस वृत्ति को बहुत बढ़ावा दिया है ....मैं भी इसके सख्त खिलाफ हूँ.
एक बहुत सही विषय पर बहुत अच्छी पोस्ट .......बधाई

विवेक Call me Vish !! ने कहा…

seedhi baat ....seedhe bhawo se rakhna koi aapse seekhe!!

pranam...
aapke prashansak!!

ZEAL ने कहा…

उत्तम सोच --प्रशंसनीय निर्णय !

'उदय' ने कहा…

... prabhaavashaalee abhivyakti !

अरुणेश मिश्र ने कहा…

मौलिक कार्य के लिए बधाई ।

JHAROKHA ने कहा…

aapki yah ek sachche insaan ki pahchai ko jahir karti hai.
vastav me aapke samnejo ghatna ghatit hui mujhe lagta hai ki iasme us ladki ki bhookh ne ho use aisa karne pae majbur kia ho.
aksar aisi ghatnaaye hamare samne ghatit hoti hain par jab ham unke liye kuchh kar nahi pate to vastav
me man bahut hi dukh hota hai.
aapne ise bahut hi achhe dhang se prastut kiya hai
aabhar----
poonam

अनिल कान्त ने कहा…

आपकी यह डायरीनुमा पोस्ट अच्छी थी

BrijmohanShrivastava ने कहा…

सही है नगद पैसे देने की वजाय कुछ खाने की चीज दे दो तो ठीक है ।सुना है इन बेचारों के भी बॉस होते हैं जो नगदपैसे उनसे छुडा लिया करते है। आपने इतना तो सोचा वरना आज के समय में कौन किस के वारे में सोचता है।

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

सही करती हैं आप और हमें भी सिखा दिया कि पैसे नही खाने की चीजें देना ठीक है ।

ALOK KHARE ने कहा…

aaj aapka ye soft corner bhi dekh liya, very tocuhy story...