सोमवार, 13 दिसंबर 2010

वो घर बुलाता है...

एक छोटे बच्चे के नज़रिए से बनाया हुआ भित्ती चित्र. सिल्क के कपडे पे पार्श्वभूमी पेंट कर ली और फिर  ऊपर से कढ़ाई की है.

जब ,जब पुरानी तसवीरें,

कुछ याँदें ताज़ा करती हैं ,

हँसते ,हँसते भी मेरी

आँखें भर आती हैं!



वो गाँव निगाहोंमे बसता है

फिर सबकुछ ओझल होता है,

घर बचपन का मुझे बुलाता है,

जिसका पिछला दरवाज़ा

खालिहानोमें खुलता था ,

हमेशा खुलाही रहता था!



वो पेड़ नीमका आँगन मे,

जिसपे झूला पड़ता था!

सपनोंमे शहज़ादी आती थी ,

माँ जो कहानी सुनाती थी!



वो घर जो अब "वो घर"नही,

अब भी ख्वाबोमे आता है

बिलकुल वैसाही दिखता है,

जैसा कि, वो अब नही!



लकड़ी का चूल्हाभी दिखता है,

दिलसे धुआँसा उठता है,

चूल्हा तो ठंडा पड़ गया

सीना धीरे धीरे सुलगता है!



बरसती बदरीको मै

बंद खिड्कीसे देखती हूँ

भीगनेसे बचती हूँ

"भिगो मत"कहेनेवाले

कोयीभी मेरे पास नही

तो भीगनेभी मज़ाभी नही...



जब दिन अँधेरे होते हैं

मै रौशन दान जलाती हूँ

अँधेरेसे कतराती हूँ

पास मेरे वो गोदी नही

जहाँ मै सिर छुपा लूँ

वो हाथभी पास नही

जो बालोंपे फिरता था

डरको दूर भगाता था...



खुशबू आती है अब भी,

जब पुराने कपड़ों मे पडी

सूखी मोलश्री मिल जाती

हर सूनीसी दोपहरमे

मेरी साँसों में भर जाती,

कितना याद दिला जाती ...



नन्ही लडकी सामने आती

जिसे आरज़ू थी बडे होनेके

जब दिन छोटे लगते थे,

जब परछाई लम्बी होती थी...





बातेँ पुरानी होकेभी,

लगती हैं कल ही की

जब होठोंपे मुस्कान खिलती है

जब आँखें रिमझिम झरती हैं

जो खो गया ,ढूँढे नही मिलेगा,

बात पतेकी मुझ ही से कहती हैं ....

33 टिप्‍पणियां:

अरूण साथी ने कहा…

जो खो गया ,ढूँढे नही मिलेगा,


जरूर मिलेगा खोजिए तो सही

ajit gupta ने कहा…

विगत कितना याद आता है? पता नहीं हम हमेशा अतीत को सुनहरे सपनों की तरह क्‍यों लेते हैं। वर्तमान कितना ही सुन्‍दर हो लेकिन अतीत का झोपड़ा भी सुखदायी क्‍यों ह‍ोता है? शायद यह मानव स्‍वभाव ही होगा।

shekhar suman ने कहा…

मैं तो कढ़ाई को ही बहुत देर तक देखता रह गया....
और उसपर से इतनी प्यारी कविता....
एक शब्द निकला मुँह से...
वाह, लाजवाब...

वो लम्हें जो याद न हों........

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

जितनी सुन्दर कलाकृति है उतनी ही सुन्दर कविता है ... मनमोहक कढाई और दिल में यादों का तूफ़ान जगाने वाली कविता के लिए आभार !

'उदय' ने कहा…

... ab kyaa kahen ... ek shaandaar-jaandaar post !!!

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीय क्षमा जी..
नमस्कार !
..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

संजय भास्कर ने कहा…

बेहद ख़ूबसूरत और उम्दा

गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

वन्दना ने कहा…

इतनी सुन्दर कलाकृति के साथ भावों का सुन्दर समन्वय्।

विवेक Call me Vish !! ने कहा…

बरसती बदरीको मै

बंद खिड्कीसे देखती हूँ

भीगनेसे बचती हूँ

"भिगो मत"कहेनेवाले

कोयीभी मेरे पास नही

तो भीगनेभी मज़ाभी नही... bahut khoobsurat! maza aa gya.....

Jai Ho Mangalmay Ho

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वो घर जो अब "वो घर"नही,

अब भी ख्वाबोमे आता है

बिलकुल वैसाही दिखता है,

जैसा कि, वो अब नही!

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ....और भित्ति चित्र तो कमाल ही है ...

रोहित ने कहा…

BAHUT SUNDAR AVIVYAKTI..
BACHPAN..GHAR.. SAB EK SAAT NAJAR KE SAAME GHUM GAYE!!!!!!!!



REGARDS..
ROHIT!!!!

hot girl ने कहा…

nice poem,

lovely blog.

shikha varshney ने कहा…

आज सबसे ऊपर आपका चित्र उसपर कड़ाई ...बहुत ही सुन्दर है उसपर कविता ...चेरी ऑन द टॉप.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति .

शारदा अरोरा ने कहा…

behad sanvedan-sheel

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

जो वक्त बीत जाता है दुबारा नहीं मिलता..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

उफ्फ्फ्फ्फ़!! कौन सी दुनिया में ले गयीं आप मुझे... मुझे तो चिकोटी काटकर देखना पड़ा कि मैं सपना तो नहीं देख रहा!
और फ्लैश बेक कह्तम हो गया!!

शोभना चौरे ने कहा…

ऑफ आप भी कहाँ ले जाती है ?
चलके नयन मोरा कसके रे जियरा
बचपन की जब याद आये रे ...
बहुत सुन्दर कविता

निर्मला कपिला ने कहा…

रचना पढ कर विगत की यादें दिल भिगो गयी सच मे अब वो सब कहाँ। कढाई बहुत अच्छी लगी। किसी समय बहुत शौक था अब वो भी छूट गया। शुभकामनायें।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

लकड़ी का चूल्हाभी दिखता है,
दिलसे धुआँसा उठता है,
चूल्हा तो ठंडा पड़ गया
सीना धीरे धीरे सुलगता है ...

ओउफ्फ़ ये गहरी यादें ... सीने में सुलगती अहिं पर वो बचपन और उसका सामां नहीं आता .... दूसरी दुनिया में ले गयी आपकी रचना ...

mridula pradhan ने कहा…

itni sunder yaaden hain ki hum bhi kho gaye unmen.

निर्झर'नीर ने कहा…

जो खो गया ,ढूँढे नही मिलेगा,

samajh nahi aata kai baar ki pahle aapki kavita ki tariif karun ya aapki is jaduii kala kii (भित्ती चित्र. सिल्क के कपडे पे पार्श्वभूमी पेंट कर ली और फिर ऊपर से कढ़ाई की है.)

u r great at every factor of human values.

tah-e-dil se aapko bandhaii deta hun swikar karen

Apanatva ने कहा…

kshamajee aapkee kala kee tareef karne ke liye shavdo kee kamee mahsoos ho rahee hai .aap to ateet me le gayee.......ye to anmol khazana hai sadaiv sath rahega..........
hamara vartman bhee hamare baccho ke liye aur hamare liye bhee bhavishy me ateet banne wala hai isee se har pal anmol hai.........sirf ateet nahee.......
Aisa mera sochana hai.......
aapkee painting embroidary to lajawab hai hee....

Apanatva ने कहा…

kshamajee aapkee kala kee tareef karne ke liye shavdo kee kamee mahsoos ho rahee hai .aap to ateet me le gayee.......ye to anmol khazana hai sadaiv sath rahega..........
hamara vartman bhee hamare baccho ke liye aur hamare liye bhee bhavishy me ateet banne wala hai isee se har pal anmol hai.........sirf ateet nahee.......
Aisa mera sochana hai.......
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हिंदीब्लॉगजगत ने कहा…

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Khare A ने कहा…

chitrkari shaan dar he, aur aapki kavita bhi,
bas yahi kahunga,

gujra hua jamana , aata nhi dubara,
hafiz khuda tumhara

हरीश प्रकाश गुप्त ने कहा…

भावनाएं इसी तरह शब्दों में व्यक्त होती हैं। कविता की लम्बाई कुछ अधिक हो गई है।

आभार

abhi ने कहा…

कहाँ ले चली आप हमें इस बार :)

बहुत बहुत ज्यादा पसंद आई ये कविता..
और तस्वीर तो बेहद खूबसूरत....बहुत ज्यदा

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

sundar rachna

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बरसती बदरीको मै

बंद खिड्कीसे देखती हूँ

भीगनेसे बचती हूँ

"भिगो मत"कहेनेवाले

कोयीभी मेरे पास नही

तो भीगनेभी मज़ाभी नही..

एकदम natural और कामयाब प्रस्तुति .

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

vartmaan acchha ho ya bura lekin shayed bachpan se jyada sunder nahi ho sakta aur isiliye bhulaye nahi bhoolta.
aankhe nam ho aayi aur aapke saath hamare bachpan ki jhoola bhi jhool aaye ham.

dipayan ने कहा…

एक सुन्दर चित्र के साथ साथ, एक सुन्दर लेख । आपकी रचना पढ़कर बचपन की याद आ गई, जब खुले आँगन मे घूमते और खेलते थे ।
अब तो मुम्बई मे एक कमरे से निकलकर दूसरे मे जाते ही, घर की सीमायें समाप्त हो जाती है ।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बातेँ पुरानी होकेभी,

लगती हैं कल ही की

जब होठोंपे मुस्कान खिलती है

जब आँखें रिमझिम झरती हैं

जो खो गया ,ढूँढे नही मिलेगा,

बात पतेकी मुझ ही से कहती हैं ....

बेहतरीन पंक्तियाँ हैं.

सादर