शनिवार, 27 अगस्त 2011

शमा हूँ मै...


सिल्क के चंद टुकड़े जोड़ इस चित्र की पार्श्वभूमी बनाई. उस के ऊपर दिया और बाती रंगीन सिल्क तथा कढाई के ज़रिये बना ली. फ्रेम मेरे पास पहले से मौजूद थी. बल्कि झरोखानुमा फ्रेम देख मुझे लगा इसमें दिए के  सिवा और कुछ ना जचेगा.बना रही थी की,ये पंक्तियाँ ज़ेहन में छाती गयीं....

रहगुज़र हो ना हो,जलना मेरा काम है,
जो झरोखों में हर रात जलाई जाती है,
ऐसी इक  शमा हूँ मै..शमा हूँ मै...

 परछाईयों संग झूमती रहती हूँ मै,
सदियों मेरे नसीब अँधेरे हैं,
सेहर होते ही बुझाई  जाती हूँ मै...


36 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

सहर होते ही शमा का रोल भी पूरा हो जाता है --सुन्दर कलाकृति!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

शमा यूँ ही जलती रहे, विश्वास बना रहे।

शारदा अरोरा ने कहा…

khoobsoorat kalakriti ...shama ka dard shama hi jaanti hai ..kisne dekha hai shama ko boond boond mitate hue ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत ...

मैंने भी कभी कुछ लिखा था ..

मैं शमादान की
अधजली शमा हूँ
अँधेरा होते ही
जला ली जाती हूँ मैं
और उजेरा होते ही
एक फूंक से बुझा दी जाती हूँ ....

ktheLeo ने कहा…

वाह! क्या रोशन बयाँ है!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

सुन्दर आकृति और पंक्तियाँ...
सादर...

mridula pradhan ने कहा…

bahot sunder.

ZEAL ने कहा…

शमा से तो हर किसी को प्रेरणा लेनी चाहिए। खुद जलकर रौशनी करना औरों की खातिर ही उसकी फितरत है।

सदा ने कहा…

परछाईयों संग झूमती रहती हूँ मै,
सदियों मेरे नसीब अँधेरे हैं,
सेहर होते ही बुझाई जाती हूँ मै...

गहरे उतरते शब्‍द ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति, आभार ।

Rajey Sha राजे_शा ने कहा…

आपने बेहद खूबसूरती से समय का सदुपयोग कि‍या है
पढ़ि‍ये नई कवि‍ता : कवि‍ता का वि‍षय

Apanatva ने कहा…

bahut khppbsoorat .

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति।

संजय भास्कर ने कहा…

बेहद सुन्दर लिखा है आपने... क्या बात है ..

amrendra "amar" ने कहा…

बहुत सुन्दर भाववान रचना...

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत...

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

एक बात माननी होगी .. आपमें गजब का धैर्य है ... इतनी सुन्दर कलाकृति ... वाह !

kumar zahid ने कहा…

क्षमाजी!
और कुदरत का करिश्मा देखिए कि जिसके सामने जाती है शमा वह रोशनी से नहा उठता है...महफिलों में उसके लिए वाह वाह के झूमर जगमगा उठते हैं।
कभी गालिब के सामने आई शमा तो कभी मीरे के, कभी मोमिन के सामने रखी गई. बहादुर शाह जैसे बादशाह शायर के सामने ,,,साहिर , शकील ,हसरत से लेकर गुलजार और निदा और बशीर और राना और ..ये सिलसिला रुकता ही नहीं है...शमा जिन्दाबाद!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

शमा का बुझना उसके मक़साद की कामयाबी है.. अकेली तीरगी से लड़ाती सारी रात फिर भी हार नहीं मानती!!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

हम दोनों दोस्तों के परिवार की तरफस ए आपको ईद मुबारक!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 01-09 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज ... दो पग तेरे , दो पग मेरे

राकेश कौशिक ने कहा…

गजब की कलाकृति - अद्भुत प्रस्तुति

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

shama ki baat ho ya zindgi ka safar, bas chalte jana hai jalte jana hai...shubhkaamnaayen.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

आप तो ग़ज़ब की कलाकार हैं.

daanish ने कहा…

शम्मा हर रंग में जलती है सहर होने तक ...

बहुत खूब
सजाया , सँवारा , निखारा है
और बहुत ही खूब
पढवाया है ...
वाह !

शोभना चौरे ने कहा…

बहुत खूबसूरत कढ़ाई भी एवम रचना भी

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

शमा जी
नमस्कार
बहुत ही अच्छी कढाई और फ्रेम वर्क है . आपकी कला को तो देख चूका हूँ , बहुत अच्छा लगा. और आपकी नज़्म भी प्यारी सी है ..

बधाई !!
आभार
विजय
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कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

दिगम्बर नासवा ने कहा…

परछाईयों संग झूमती रहती हूँ मै,
सदियों मेरे नसीब अँधेरे हैं,
सेहर होते ही बुझाई जाती हूँ मै...

शाम तो सहर आने तक ही जलती है ... बेहद लाजवाब चित्रकारी है ....

mridula pradhan ने कहा…

bahot sunder.

Kajal Kumar ने कहा…

सुंदर कृति.

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

जीवन के यथार्थ को बयां करती सार्थक प्रस्‍तुति।

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कब तक ढ़ोना है मम्‍मी, यह बस्‍ते का भार?
आओ लल्‍लू, आओ पलल्‍लू, सुनलो नई कहानी।

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

क्षमा जी, शायद आपने ब्‍लॉग के लिए ज़रूरी चीजें अभी तक नहीं देखीं। यहाँ आपके काम की बहुत सारी चीजें हैं।

Ankit pandey ने कहा…

एक-एक शब्द भावपूर्ण ...
संवेदनाओं से भरी बहुत सुन्दर कविता.

abhi ने कहा…

Beautiful!!!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

सुंदर।