बुधवार, 30 सितंबर 2009

do kshanikayen ...

१) देर ना कर राही...

देर कर राही , अपनी मंजिल खोज ले ,
नही लौटने वाले ये क़ीमती लम्हें ,
या हाथ पकड़ इन राहों के ...
भोर तेरी मंजिल , तय कर ले ..

२ )ग़म का  इतिहास  

लंबा गम का इतिहास यहाँ ,
किश्तों में सुनाते   हैं ,
लो अभी शुरू ही किया ,
और वो उठके चल दिया ?

7 टिप्‍पणियां:

Jogi ने कहा…

:)

Jogi ने कहा…

लो अभी शुरू ही किया ,
और वो उठके चल दिया ?

i couldnt stop myself to smile on these lines..this is one of the truest truth of life...hum sabhi dhundhte hain ki koi ho jo sun sake.. :) is sign ka matlab smile hai ..
'koi dost hai na raqeeb hai ,
tera saher kitna ajeeb hai ..
main kise kahu mere saath chal ,
yahan sab ke sir pe saleeb hai ...'these lines are perfect..as i feel

M VERMA ने कहा…

बेहतरीन अभिव्यक्ति
लो अभी शुरू ही किया ,
और वो उठके चल दिया ?

MUFLIS ने कहा…

कम अल्फाज़ का इस्तेमाल करते हुए भी
इतनी बड़ी और पायेदार बात कह देना
अपने आप में एक महारत माना जाता है
और ...आपको ये फ़न हासिल है
अभिवादन स्वीकारें
---मुफलिस---

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

रचना बहुत सुन्दर है. अचानक ही एक अन्य शेर याद आ गया-
बडे शौक से सुन रहा था ज़माना
तुम्हीं सो गये दास्तां कहते-कहते.

shikha varshney ने कहा…

Wah kya baat hai bahut sunder abhivyakti..
"abhi to shuru kia tha
or vo uth kar chal diye"
bahut khoob.

"लोकेन्द्र" ने कहा…

बेहतरीन....