शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

waqt

 वक़्त

हम  ना  भी  गँवाते ,
लम्हों ने गुज़रना था,
मुट्ठी में क़ैद करते,
वक़्त ने फिसलना था,
अपने पैरों को जमाते,
ज़मीं ने खिसकना था!

6 टिप्‍पणियां:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

हां हर हाल में वक्त को तो निकलना ही था. कहां पकड पाते हैं हम उसे? और कहां कदम मिला पाते हैं उसके साथ..

शोभना चौरे ने कहा…

apne aap ko apni bhavnao ko vykt karne ke liye aapke pas har vidha hai .badhai

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

अजी बहुत सुन्दर तरीके से आपने वक़्त को परिभाषित कर दिया। सच है वक़्त कब किसकी राह देखता है।
दूसरी बात, आपने जिस उद्देश्य को ध्यान में रख सिमटे लम्हे शुरू किया है, मेरी शुभकामनायें हैं वो अपने लक्ष्य को बेधे। आपकी बाते प्रभावित करती है।

"लोकेन्द्र" ने कहा…

वाह बहुत खूब.....

lalit sharma ने कहा…

ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं, लेखन कार्य के लिए बधाई
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Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

aapne theek kaha wakt ret kee tarah muththi se fisal jata hai. aur pal pal karke gujar jata hai.