सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

Aahat

दूर  से  इक आहट आती रही,
ज़िंदगी का  सामाँ   बनाती रही,
चुनर हवा में उडती रही,
किसीने आना था नही,
हवा फिर भी गुनगुनाती रही..
दूर से इक आहट आती रही..

7 टिप्‍पणियां:

ज्योति सिंह ने कहा…

is rachana ko padhkar mujhe apni line jo subhah se khyaal me ghum rahi magar likh nahi paai wo yaad aa gayi .bahut pyari rachana hai mithi si .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

अब मैं क्या कहूँ?
बेहतरीन और लाजवाब मुक्तक प्रस्तुत किया है आपने।

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

DOOR KE DHOL SUHAVNE HOTE HE>>esa bhi kahte he.
achhi he chnd panktiya.

Basanta ने कहा…

Lovely!

Babli ने कहा…

वाह आपकी ये छोटी सी प्यारी सी कविता मुझे बेहद पसंद आया !

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

ये आहट ही तो आस जगाये रखती है । सुंदर मुक्तक ।

sunil kumar sagar ने कहा…

chand pnktiyon ne bikher diya zadoo
aap ka blog pade bina nhee raha dil par kaboo