गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

मुकम्मल जहाँ ...ek kshanika...

मैंने कब मुकम्मल जहाँ माँगा?
जानती हूँ नही मिलता!
मेरी जुस्तजू ना मुमकिन नहीं !
अरे पैर रखनेको ज़मीं चाही
पूरी दुनिया तो नही मांगी?

4 टिप्‍पणियां:

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut sundar rachana

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

कितना मासूम सा सवाल और मासूम सी इच्छा..

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

छोटी सी अरदास, पर शायद समय को वो भी मंज़ूर नहीं.
समय विपरीत क्या गति नहीं बना डालता,

बढ़िया रचना.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

Jogi ने कहा…

wow...beautiful one...expressed amazing things in these 5 lines