शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

पलक भी ना झपकी.....

जिस रात की,चाहते थे, सेहर ही  ना हो,
पलक भी ना झपकी ,बसर हो गयी! 

उस  की पैरहन पे सितारे जड़े थे,
नज़र कैसे  उतारते ,सुबह हो गयी!

झूम के खिली थी रात की रानी,
साँस भी ना ली ,खुशबू फना  हो गयी...

जुगनू ही जुगनू,क्या नज़ारे थे,तभी,
निकल  आया  सूरज,यामिनी छल   गयी!




22 टिप्‍पणियां:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

जुगनू ही जुगनू,क्या नज़ारे थे,तभी,
निकल आया सूरज,यामिनी छल गयी!
bahut jabardast...

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून ने कहा…

वाह बहुत सुंदर .

केवल राम ने कहा…

जिस रात की,चाहते थे, सेहर ही ना हो,
पलक भी ना झपकी ,बसर हो गयी!

सुंदर भावों से सजी रचना .....आपका आभार

संजय भास्‍कर ने कहा…

आदरणीय क्षमा जी
नमस्कार !
बहुत ही सटीक लिखी गयी अभिव्यक्ति...

संजय भास्‍कर ने कहा…

आपकी लेखनी अद्भुत है.....

संजय भास्‍कर ने कहा…

....दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती
बहुत सुंदर ........हमेशा की तरह

Arun sathi ने कहा…

सुन्दर अहसास लिए अच्छी रचना।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

अच्छी गीत रचना.. नवीनता है शब्दों में.. शीर्षक रोमन में क्यों??

mridula pradhan ने कहा…

bahut sundar likha hai.....

vandan gupta ने कहा…

गज़ब के शेर लिखे है ……………हर शेर दिल मे उतरता हुआ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

झूम के खिली थी रात की रानी,
साँस भी ना ली ,खुशबू फना हो गयी...
--
सुन्दर रचना!

Arvind Mishra ने कहा…

सूरज कब किसके लिए रुका है?

इसलिए जो कर जल्दी कर ले रे मनुआ :)

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

आदरणीय क्षमा जी सादर अभिवादन |आपकी रचना तो अच्छी है ही लेकिन उससे भी बड़ा है आपका महान व्यक्तित्व मैं जब ब्लॉग में बिलकुल नया था तब से निः स्वार्थ भाव से आपका स्नेह मुझे मिलता रहता है |मैं इस इंसानियत के पवित्र भाव से अभिभूत हूँ |आभार

मीनाक्षी ने कहा…

जिस रात की,चाहते थे, सेहर ही ना हो,
पलक भी ना झपकी ,बसर हो गयी! ---
दिल में उतर गया वैसे पूरी रचना ही खूबसूरत है .

मीनाक्षी ने कहा…

जिस रात की,चाहते थे, सेहर ही ना हो,
पलक भी ना झपकी ,बसर हो गयी! ---
दिल में उतर गया वैसे पूरी रचना ही खूबसूरत है .

Kunwar Kusumesh ने कहा…

वाह .... बहुत खूब

आनंद ने कहा…

आदरणीय क्षमा जी कान पकड़ के माफ़ी मांगता हूँ कि आपका यह ब्लॉग अभी तक नही पढ़ पाया था
..इससे पहले केवल एक रचना पढ़ी थी मैंने ....
अब माफ़ी मांग तो रहा हूँ अपनी गलती के लिए ...
जुगनू ही जुगनू,क्या नज़ारे थे,तभी,
निकल आया सूरज,.....यामिनी छल गयी!
पूरी कविता का एक एक शब्द आल्हादक ...क्या दर्द है क्या माधुर्य लिए हुए दर्द है...बहुत लाजबाब प्रस्तुति !

सदा ने कहा…

वाह ... बहुत खूब कहा है ।

Satish Saxena ने कहा…

बेहतरीन भाव ! हार्दिक शुभकामनायें आपको !

BrijmohanShrivastava ने कहा…

चारों शेर उत्तम

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

अच्छा है. बधाई

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

खूबसूरत भाव।
..सेहर या सहर।