रविवार, 26 जून 2011

दूर अकेली चली......



कपडेके चंद टुकड़े, कुछ कढाई, कुछ डोरियाँ, और कुछ water कलर...इनसे यह भित्ति चित्र बनाया था...कुछेक साल पूर्व..


वो राह,वो सहेली...
पीछे छूट चली,
दूर  अकेली  चली  
गुफ्तगू, वो ठिठोली,
पीछे छूट चली...

किसी मोड़ पर  मिली,
रात इक लम्बी अंधेरी,
रिश्तों की भीड़ उमड़ी,
पीछे छूट चली...

धुआँ पहन  चली गयी,
'शमा' एक जली हुई,
होके बेहद अकेली,
जब बनी ज़िंदगी पहेली
वो राह ,वो सहेली...

ये कारवाँ उसका नही,
कोई उसका अपना नही,
अनजान बस्ती,बूटा पत्ती,
बिछड़ गयी कबकी,
वो राह,वो सहेली...


31 टिप्‍पणियां:

अरूण साथी ने कहा…

bahut khoob....dil se..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

भित्ति चित्र के साथ ही शब्दों से सजी खूबसूरत रचना ...

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

apki rachna padh kar ek gane ke bol yaad aa gaye...

tu akela hi nahi hai is safar me ham bhi tere sath hain.

so khud ko akela kabhi mat samajhiye.
bahut pyari rachna...man ke ehsaso ko shabd-badhh karti.

राकेश कौशिक ने कहा…

"ये कारवाँ उसका नही,
कोई उसका अपना नही"

कविता और भित्ति चित्र का अनूठा संगम

abhi ने कहा…

आपकी कलाकारी तो कमाल ही होती है, मुझे बेहद पसंद है.

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

किसी से बिछड़ना, किसी और से मिलने का संकेत होता है... हाँ वो मंज़िल जहाँ बिछड़े सभी बारी बारी, वाक़ई तन्हाई की इंतिहाँ कहलाती है!!

आपकी कविता हमेशा की तरह दिल से निकली है और कलाकृति मनभावन है!!

Arvind Mishra ने कहा…

माजी की पीड़ा भरी यादें! .

Kailash C Sharma ने कहा…

ये कारवाँ उसका नही,
कोई उसका अपना नही,
अनजान बस्ती,बूटा पत्ती,
बिछड़ गयी कबकी,
वो राह,वो सहेली...

बहुत मर्मस्पर्शी सुन्दर प्रस्तुति...बहुत संवेदनशील

Kajal Kumar ने कहा…

एक सुंदर धाराप्रवाह रचना.

मनोज कुमार ने कहा…

कविता और चित्र का अनूठा संगम यहीं मिलता है। और शब्दों का जो बिम्ब आपने उकेरा है वह दिल को छूते हैं।

सतीश सक्सेना ने कहा…

पुराने गहरे अहसास ....
शुभकामनायें

शारदा अरोरा ने कहा…

rangon ko ukerna koi aap se seekhe ...lakhni se bhi aur sui taage se bhi ...

शारदा अरोरा ने कहा…

rangon ko ukerna koi aap se seekhe ...lakhni se bhi aur sui taage se bhi ...

सदा ने कहा…

ये कारवाँ उसका नही,
कोई उसका अपना नही,
अनजान बस्ती,बूटा पत्ती,
बिछड़ गयी कबकी,
वो राह,वो सहेली...

गहन भावों का समावेश ...।

इमरान अंसारी ने कहा…

सत्य तो यही है की सभी पीछे छुट जाने हैं एक दिन..........चित्र बहुत सुन्दर है.....आभार|

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 28 - 06 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच-- 52 ..चर्चा मंच

रोहित ने कहा…

ये कारवाँ उसका नही,
कोई उसका अपना नही!

...YAADO KO SHABDO ME SAMETE NIHAYAT HI KHOOBSURAT RACHNA!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

शब्दों की और कपड़ों की चित्रकारी अद्भुत है।

नीलांश ने कहा…

bahut sunder rachna..aur acchi sketch

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

वाह! कितना प्यारा भित्ति चित्र है!
अवश्य चित्र ने कविता को जन्म दिया होगा, कविता ने चित्र को नहीं।

वन्दना ने कहा…

ये कारवाँ उसका नही,
कोई उसका अपना नही,
अनजान बस्ती,बूटा पत्ती,
बिछड़ गयी कबकी,
वो राह,वो सहेली...

ज़िन्दगी का दर्द उतार दिया कविता मे और चित्र भी लाजवाब है।

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' ने कहा…

बहुत सुन्दर...बधाई

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri ने कहा…

वो राह,वो सहेली...
पीछे छूट चली,
दूर अकेली चली
गुफ्तगू, वो ठिठोली,
पीछे छूट चली...
सुन्दर भाव ..जीवन में पीछे छूट गयी मृदुल यादें समेटे हुए सुन्दर रचना साथ ही आपकी सृजनशीलता की प्रतीक कलाकृति...अति सुन्दर

Apanatva ने कहा…

lajawab kalakrutiaur aur udaasee me lipta geet bhavo kee sunder abhivykti.

Apanatva ने कहा…

lajawab kalakrutiaur aur udaasee me lipta geet bhavo kee sunder abhivykti.

Suman ने कहा…

vakai bahut khubsurat rachna .......

ashish ने कहा…

आपकी चित्रकारी और शब्दों की जादूगरी , दोनों में जीवन के सारे लम्हे सिमट जाते है

mahendra srivastava ने कहा…

क्या कहूं..बहुत सुंदर रचना..
आपको बहुत बहुत बधाई

mridula pradhan ने कहा…

wah....sone men suhaga.

शोभना चौरे ने कहा…

बहुत सुन्दर भावो से सजी कविता और उतना ही सुन्दर चित्र |
आपकी क्लाक्र्तिया देखकर आपसे मिलने का बहुत मन होता है |

Anand Dwivedi ने कहा…

ये कारवाँ उसका नही,
कोई उसका अपना नही,
अनजान बस्ती,बूटा पत्ती,
बिछड़ गयी कबकी,
वो राह,वो सहेली...

बड़े दिन बाद आपको पढ़ने का सौब्ग्य मिल रहा है क्षमा जी ...क्या सुन्दर लेखन है कुछ दुबार नहि मिलता जिंदगी कि यही रीत है.