सोमवार, 4 जुलाई 2011

उड़ जा ओ परिंदे!


पँछी  तो कढाई से बना है. पत्तों के लिए सिल्क हरे रंग की छटाओं   में रंग  दिया और आकार काट के सिल दिए. घोंसला बना है,डोरियों,क्रोशिये और धागों से. पार्श्व भूमी है नीले रंग के, हाथ करघे पे बुने, रेशम की.

चल उड़ जा ओ परिंदे!
तू नीड़ नया बना ले रे ,
न आयेगा अब लौट के,
इक बार जो  फैले पंख रे,
जहाँ तूने खोली आँखें,
जहाँ तूने निगले दाने रे !


38 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

वाह कितना सुन्दर और जीवंत !

रोहित ने कहा…

BEHAD SUNDAR..........
KHNE KO SHABD KAM PAD JAATE HAI!

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीय क्षमा जी!..
बहुत बढ़िया, लाजवाब!
निराला अंदाज है. आनंद आया पढ़कर.

संजय भास्कर ने कहा…

अति सुंदर ओर लाजवाब रचना

shikha varshney ने कहा…

बाह चित्र और रचना ..बहुत ही सुन्दर.

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

हम तो बाबुल तोरे अंगना की चिड़िया!!
चल उड़ जा रे पंछी!!

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

सुन्दर कृति........
पक्षी , उसका घोंसला और रचना

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जीवन आगे बढ़ते रहने का नाम है, सुन्दर पंक्तियाँ।

राकेश कौशिक ने कहा…

जीवंत प्रस्तुति

कुश ने कहा…

घोंसले में पक्षी.. वाह..!!

राकेश कौशिक ने कहा…

जीवंत प्रस्तुति - वाह

निर्मला कपिला ने कहा…

क्षमा इतनी सुन्दर चीज़ें बना कर दिखाओगी तो मै किसी दिन जरूर फर्माइश कर बैठूँगी। तुम्हारी प्रतिभा देख कर खुशी होती है। शुभकामनायें।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

कम शब्दों मं बढ़िया रचना!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

कम शब्दों मं बढ़िया रचना!

सदा ने कहा…

वाह ...बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

वन्दना ने कहा…

वाह वाह बहुत ही सुन्दर कृति।

abhi ने कहा…

किसकी तारीफ़ करूँ? पंक्तियों की या फिर चित्र की? :)

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut khoobsoorat chitr aur panktiyan bhi ...

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

isme chhupe dard ko padh pa rahi hun main. aur aapki kadhayi ki kya tareef karu....lagta hai ki kahin koi bhi shabd aapki is kala ka apmaan na kar de.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत सुन्दर ... लाजवाब रंग भरे आहें आपने दोनों में ... चित्र और शब्द .. कमाल है ...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुंदर ... ...... जीवंत , मनमोहक प्रस्तुति....

himkar ने कहा…

अद्भुत सौंदर्यबोध !
आपकी कलाकृतियाँ और कवितायें, दोनों लाजवाब हैं. साहित्य और कला का यह संगम अनूठा है.
इस अनमोल सृजन के लिए आपको बधाई.

Avinash Chandra ने कहा…

अत्यंत मनोहारी, बहुत सुन्दर!!

Vivek Jain ने कहा…

सुंदर चित्र, खूबसूरत पंक्तियां,
आभार- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Manish ने कहा…

वाह!! बेहद कम शब्दों में एक गूढ़ बात कह दी आपने..
न आयेगा अब लौट के.. एक माता के लिए पुत्र प्रेम सा प्रतीत होता है.

Kailash C Sharma ने कहा…

कुछ शब्दों में जीवन का कितना कटु सत्य चित्रित कर दिया...लाज़वाब

Kajal Kumar ने कहा…

वाह नितांत सुंदर व जीवंत

daanish ने कहा…

बहुत खूबसूरत
कल्पना भी
आकार भी
वाह !!

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कविता क्षमा जी बधाई |

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत ही सुंदर कल्पना और कविता बधाई क्षमा जी |

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बहुत ही सुंदर.

aarya ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना ! इसमे नारी के उस रूप का वर्णन मिलता है जब वह बेटी से बहू बनकर दुसरे परिवार में जाती है अपनी दुनिया का विस्तार करने ...फिर पीछे की दुनिया बस याद बनके रह जाती है.........अगर मैं इन 6 पंक्तिओं का वर्णन करूँ तो पूरा अध्याय बन जायेगा और फिर भी कुछ न कुछ छूट ही जायेगा !
जब कवि पूरे समुद्र को अपने शब्दों के घड़े में बांध देता है तो बस उसकी कल्पना ही की जा सकती है वर्णन मुश्किल हो जाता है ......
डॉ. रत्नेश त्रिपाठी

sm ने कहा…

beautiful poem

घनश्याम मौर्य ने कहा…

नीड़ का निर्माण अच्‍छा किया है आपने।

Dr. shyam gupta ने कहा…

सुन्दर कढाई ..व शब्द चित्र ...

Maheshwari kaneri ने कहा…

छूटेंगी तेरी सखियाँ,
छूटेंगी नैहर की गलियाँ,
छूटेंगी दादी,माँ और बहन,
छूटेगा अब ये आँगन,
न लौटेगा मस्तीभरा सावन,
छूटेंगी ये गुड़ियाँ,...बहुत मामूम शब्दों में बचपन को चित्रित किया..सुन्दर..मेरे ब्लांग में आने के लिए बहुत बहुत धन्यबाद...

रेखा ने कहा…

बहुत सुन्दर और काफी रोचक

कविता रावत ने कहा…

bahut badiya prastuti..
bahut pyari tasveer..