बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

दीवारें बोलती नही..


क्षमा प्रार्थी हूँ,की, एक पुरानी रचना पेश कर रही हूँ....!


खादी सिल्क से दीवारें तथा रास्ता बनाया है..क्रोशिये की बेलें हैं..और हाथसे काढ़े हैं कुछ फूल-पौधे..बगीचे मे रखा statue plaster ऑफ़ Paris से बनाया हुआ है..

 सुना ,दीवारों  के  होते  हैं  कान ,
काश  होती  आँखें और लब!
मै इनसे गुफ्तगू   करती,
खामोशियाँ गूंजती हैं इतनी,
किससे बोलूँ? कोई है ही  नही..

आयेंगे हम लौट के,कहनेवाले,
बरसों गुज़र गए , लौटे नही ,
जिनके लिए उम्रभर मसरूफ़ रही,
वो हैं  मशगूल जीवन में अपनेही,
यहाँ से उठे डेरे,फिर बसे नही...

सजी बगिया को ,रहता है  फिरभी,
इंतज़ार क़दमों की आहटों का,
पर  कोई राह इधर मुडती नही ,
पंखे की खटखट,टिकटिक घड़ी की,
अब बरदाश्त मुझसे होती नही...


34 टिप्‍पणियां:

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

कला का एक उत्तम नमूना...और उसीके अनुरूप सुन्दर रचना...बहुत अच्छा लग रहा है!

indianrj ने कहा…

सुना ,दीवारों के होते हैं कान ,
काश होती आँखें और लब!
मै इनसे गुफ्तगू करती
दिल को छू गई और अन्दर तक हिला दिया. बेहतरीन!

vidya ने कहा…

आयेंगे हम लौट के,कहनेवाले,
बरसों गुज़र गए , लौटे नही ,
जिनके लिए उम्रभर मसरूफ़ रही,
वो हैं मशगूल जीवन में अपनेही,
यहाँ से उठे डेरे,फिर बसे नही...

बहुत सुन्दर...
मगर गम क्यूँ करना...वो ना आयें ..बगिया में कोई और आयेंगे...फूल तब भी मुस्कुराएंगे..

सादर.

Basanta ने कहा…

The art and the poetry both are so beautiful and refreshing.

वन्दना ने कहा…

सजी बगिया को ,रहता है फिरभी,
इंतज़ार क़दमों की आहटों का,
पर कोई राह इधर मुडती नही ,
पंखे की खटखट,टिकटिक घड़ी की,
अब बरदाश्त मुझसे होती नही...्दर्द उभर आया।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

भाव बड़े ही सुन्दर हैं.

Rajesh Kumari ने कहा…

aapki kala aur kavita dono ko salaam addbhut.

शारदा अरोरा ने कहा…

ek lambe intizar ko darshati ...khoobsoorat kavita..

shikha varshney ने कहा…

आपकी कलात्मकता को प्रणाम .

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हर घर एक व्यक्ति का स्वरूप ले लेता है, दीवारें कान है..

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

had hai....

dekhiye jo aate hain aapke batan dabate hi aap unko dekhte hi nahi...baat karna chaahte hi nahi to koi kya kare.....?

kabhi ham se bhi guftgoo kar lo...jab bhi dwar khologe hame apne dware paogi....

jo aane wale rasta bhool gaye unka intzaar kya kiije...
ham jo baithe hain dar pe...ham se
kuchh baat to kije.

(ha.ha.ha.).

BE HAPPY....

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत.. सिर्फ इस एक लफ्ज़ में आपकी कविता और कलात्मकता बयान की जा सकती है!! परमात्मा आपको सेहतयाब करे!!

Atul Shrivastava ने कहा…

गहरे भाव।
सुंदर रचना।

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

क्षमा जी, साहित्‍य कभी पुराना नहीं होता। आपकी इस कविता में ऐसे भाव हैं, जो इसे हमेशा तरोताज़ा रखेंगे। बधाई स्‍वीकारें।

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..की-बोर्ड वाली औरतें।
मूस जी मुस्‍टंडा...

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

तीनों ही बंध एक से एक

Arvind Mishra ने कहा…

आपकी कविताओं में चिरन्तन प्रतीक्षा का भाव मन को सदैव संवेदित करता है!और क्या कहें?

Kunwar Kusumesh ने कहा…

पहले ये बताइये की अब आपकी तबियत कैसी है ?

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

kshama ji ,
ab kaisi hain ap ?
bahut khoobsoorat nazm hai .
par aajkal aap itni mayoosi wali nazmen n likhiye please be happy
ham sab ke liye hi sahi :):)

amrendra "amar" ने कहा…

सुना ,दीवारों के होते हैं कान ,
काश होती आँखें और लब!
मै इनसे गुफ्तगू करती,
खामोशियाँ गूंजती हैं इतनी,
किससे बोलूँ? कोई है ही नही..
waah kya baat hai, kitni gehre bahv

सदा ने कहा…

आयेंगे हम लौट के,कहनेवाले,
बरसों गुज़र गए , लौटे नही ,
जिनके लिए उम्रभर मसरूफ़ रही,
वो हैं मशगूल जीवन में अपनेही,
यहाँ से उठे डेरे,फिर बसे नही...
अनुपम भाव संयोजन लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

abhi ने कहा…

आपकी पुरानी रचना भी बिलकुल फ्रेश सी लगती है!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कई बार दीवारें बिना बोले भी बहुत कुछ कहती हैं ... गुफ्तगू करती हैं ... भावमय रचना ...

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

आदरणीया क्षमा जी होली की शुभकामनाएँ |

Rishi ने कहा…

bemisal...behad khoobsurat..!!

Ankur jain ने कहा…

bahut sundar...dhanyvad ki aapne apni purani rachna se ru-b-ru karaya...

mahendra verma ने कहा…

आयेंगे हम लौट के,कहनेवाले,
बरसों गुजर गए , लौटे नही ,
जिनके लिए उम्रभर मसरूफ रही,
वो हैं मशगूल जीवन में अपने ही,
यहाँ से उठे डेरे,फिर बसे नही.

मनस्पर्शी कविता।

mahendra verma ने कहा…

आयेंगे हम लौट के,कहनेवाले,
बरसों गुजर गए , लौटे नही ,
जिनके लिए उम्रभर मसरूफ रही,
वो हैं मशगूल जीवन में अपने ही,
यहाँ से उठे डेरे,फिर बसे नही.

मनस्पर्शी कविता।

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत मर्मस्पर्शी रचना..अंतस को गहराई तक छू गयी...होली की हार्दिक शुभकामनायें!

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

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♥ होली ऐसी खेलिए, प्रेम पाए विस्तार ! ♥
♥ मरुथल मन में बह उठे… मृदु शीतल जल-धार !! ♥



आपको सपरिवार
होली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार
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Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

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♥ होली ऐसी खेलिए, प्रेम पाए विस्तार ! ♥
♥ मरुथल मन में बह उठे… मृदु शीतल जल-धार !! ♥



आपको सपरिवार
होली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार
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ज्योति सिंह ने कहा…

सुना ,दीवारों के होते हैं कान ,
काश होती आँखें और लब!
मै इनसे गुफ्तगू करती
bahut sundar likhti hai aap ,holi ki badhai aapko

Kunwar Kusumesh ने कहा…

Happy Holi.

Kailash Sharma ने कहा…

होली की हार्दिक शुभकामनायें!

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

bahut sundar kalakriti aur sundar bhaavpurn rachna, badhai.