शनिवार, 13 जुलाई 2013

अरसा बीता ...




लम्हा,लम्हा जोड़ इक दिन बना,
दिन से दिन जुडा तो हफ्ता,
और फिर कभी एक माह बना,
माह जोड़,जोड़ साल बना..
समय ऐसेही बरसों बीता,
तब जाके उसे जीवन नाम दिया..
जब हमने  पीछे मुडके देखा,
कुछ ना रहा,कुछ ना दिखा..
किसे पुकारें ,कौन है अपना,
बस एक सूना-सा रास्ता दिखा...
मुझको किसने कब था थामा,
छोड़ के उसे तो अरसा बीता..
इन राहों से जो  गुज़रा,
वो राही कब वापस लौटा?

 

कुछ  कपडे  के  तुकडे ,कुछ  जल  रंग  और  कुछ  कढ़ाई .. इन्हीं के संयोजन से ये भित्ती चित्र बनाया है.


15 टिप्‍पणियां:

parul chandra ने कहा…

कितना सुन्दर चित्रण... और उतनी ही सुन्दर कढ़ाई... आपको बधाई !

Ranjana Verma ने कहा…

बहुत ही मार्मिक और दर्द भरी अभिव्यक्ति.......!!

Ranjana Verma ने कहा…

बहुत ही मार्मिकऔर दर्द भरी अभिव्यक्ति .......!!

Ranjana Verma ने कहा…

बहुत ही मार्मिकऔर दर्द भरी अभिव्यक्ति .......!!

expression ने कहा…

जाने वाले कभी नहीं आते...जाने वालों की याद आती है....फिर चाहे वो लम्हा हो या कोई शख्स...

सुन्दर भाव.

अनु

arvind mishra ने कहा…

आपमें मौलिक सृजनात्मकता भरी पडी है -और कितना अर्थपूर्ण कलापूर्ण अतीत जिया है आपने - क्या यह कम है ?

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चित्र के साथ शब्द भी बहुत सुंदर

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जीवन का लंडा अरसा इस चित्र के रास्ते से गुज़र गया हो जैसे ... लाजवाब ....

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

क्या बात है ! बहुत ख़ूब !!!

राकेश कौशिक ने कहा…

अनुपम चित्रण

आशा जोगळेकर ने कहा…

इन रहों से जो गुजरा वो राही कब वापिस लौटा य़

कितनी खूबसूरत अभिव्यक्ति और कलाकृति भी ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पलों में खोती बरसों की जिन्दगी..

शारदा अरोरा ने कहा…

sundar chitran..

संजय भास्‍कर ने कहा…

खूबसूरत कलाकृति ...........!!!

abhi ने कहा…

कितना सच...:(