रविवार, 21 जुलाई 2013

चश्मे नम मेरे

परेशाँ हैं, चश्मे नम मेरे,

कि इन्हें, लमहा, लमहा,

रुला रहा है कोई.....



चाहूँ थमना चलते, चलते,

क़दम बढ्तेही जा रहें हैं,

सदाएँ दे रहा है कोई.....




अए चाँद, सुन मेरे शिकवे,

तेरीही चाँदनी बरसाके,

बरसों, जला रहा कोई......

8 टिप्‍पणियां:

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत ही सुंदर ......

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वाह...
बहुत सुन्दर!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूब .... दर्द भी खूबसूरती से लिखा जा सकता है ...

arvind mishra ने कहा…

वो कौन निष्ठुर किन्तु भाग्यशाली शख्स है जिसे कोई इतना सच्चे मन से याद करता है!

वो बड़ा रहीमो करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे तुझे भूलने की दुआ करूं तो मेरी दुआ में असर ना हो।।।।

गज़ब शख्सियत है भाई उसकी ...ईर्ष्या हो गयी उससे ... :-)

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

डब डब, स्वर आ रहा है कोई..

shikha varshney ने कहा…

दर्द भी सुन्दरता से व्यक्त हुआ है.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कितनी हसीन शिकायत है इस चाँद से ...
ऐसे में कौन जल न जाए ...

संजय भास्‍कर ने कहा…

दर्द भी खूबसूरती से
सुंदर रचना के लिए आपको बधाई


शब्दों की मुस्कुराहट पर .... हादसों के शहर में :)