रविवार, 14 मार्च 2010

अए अजनबी...


अए अजनबी !जब हम मिले,
तुम जाने पहचाने -से थे,
बरसों हमने साथ गुज़ारे,
क्यों बन गए पराये?
क्या हुआ, किस बातपे,
हम तुम नाराज़ हुए?
आओ एक बार फिर मिलें,
अजनबियत दिल में लिए...

11 टिप्‍पणियां:

knkayastha ने कहा…

sundar...

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

BrijmohanShrivastava ने कहा…

एक फ़िल्मी गाना भी है पुराना "अजनवी तुम जाने पहिचाने से लगते हो |और आपकी अंतिम लाइन के सम्बन्ध में भी एक फ़िल्मी गाना है "चलो इक बार फिर से अजनवी बन जाएँ हम दोनों |क्या हुआ किस बात पे हम तुम हुए पराये | किस बात पर हमसे तुम नाराज हुए ? यह प्रश्न बाचक भी हो सकता था अगर "हम तुम नाराज हुए " में थोड़ा फेर बदल होता |क्योंकि हमें तो पता होना चाहिए कि हम क्यों नाराज है वाकी आप क्यों नाराज और किस बात पर हुए | कुल मिला कर रचना अच्छी लगी |

Apanatva ने कहा…

sarthak rachana..........
sambandho ko sahejane ka prayas.............

शारदा अरोरा ने कहा…

रचना अच्छी लगी , हर दिल पी लेता है वही कुछ ..जो सालता है ...आपने मेरे ब्लॉग पर आ कर सराहना की ,दिल ने तस्सली का घूँट पिया |

MUFLIS ने कहा…

वो दूर था, तो बहुत दिल के पास रहता था
क़रीब आ के मिला है, तो फ़ासला है बहुत ...

अजनबियत का रिश्ता भी एहमियत रखता है
अपनापन इसी से शुरू होता है
रचना अच्छी है,,,,,
दिल से दिल तक वाली बात !!

Noyanika ने कहा…

these lines touched my heart -"aao ek baar phir milein, ajnabiyan dil mein liey"

Par kash ke aisa ho pata
jinhe hum kho dete hain
yuhi baton baton mein
unhe bhi wohi dard satata
jise liye na hum jee pate hain
na mar pate.

regards

Noyanika

Noyanika ने कहा…

Apne dil se likha hai! par kash ke aisa hota ki jinhe hum kho dete hain, wo bhi hamen yaad karte.

regards

noyanika

देवेश प्रताप ने कहा…

भावों से .....पूर्ण आपकी ये रचना .........बहुत बढ़िया .

Dr.R.Ramkumar ने कहा…

क्या हुआ, किस बातपे,
हम तुम नाराज़ हुए?
आओ एक बार फिर मिलें,

क्या हुआ, किस बातपे,
हम तुम नाराज़ हुए?
आओ एक बार फिर मिलें,

neelima garg ने कहा…

bahut sundar...