बुधवार, 24 मार्च 2010

मत काटो इन्हें !!

मत काटो इन्हें, मत चलाओ कुल्हाडी

कितने बेरहम हो, कर सकते हो कुछभी?

इसलिए कि ,ये चींख सकते नही?



ज़माने हुए,मै इनकी गोदीमे खेलती थी,

ये टहनियाँ मुझे लेके झूमती थीं,

कभी दुलारतीं, कभी चूमा करतीं,



मेरे खातिर कभी फूल बरसातीं,

तो कभी ढेरों फल देतीं,

कड़ी धूपमे घनी छाँव इन्हीने दी,



सोया करते इनके साये तले तुमभी,

सब भूल गए, ये कैसी खुदगर्जी?

कुदरत से खेलते हो, सोचते हो अपनीही....



सज़ा-ये-मौत,तुम्हें तो चाहिए मिलनी

अन्य सज़ा कोईभी,नही है काफी,

और किसी काबिल हो नही...



अए, दरिन्दे! करनेवाले धराशायी,इन्हें,

तू तो मिट ही जायेगा,मिटनेसे पहले,

याद रखना, बेहद पछतायेगा.....!



आनेवाली नस्ल्के बारेमे कभी सोचा,

कि उन्हें इन सबसे महरूम कर जायेगा?

मृत्युशय्यापे खुदको, कड़ी धूपमे पायेगा!!

23 टिप्‍पणियां:

Apanatva ने कहा…

nagrikaran aur sadke chodee karane naye naye bhavan banane ke liye in pedo kee hee bali chad rahee hai......
sarthak post.......
aabhar

राकेश कौशिक ने कहा…

"सब भूल गए, ये कैसी खुदगर्जी?
कुदरत से खेलते हो,"
पर्यावरण के प्रति सजग रहने विशेषकर वृक्षों न काटने का सन्देश समसामयिक सुंदर रचना.

देवेश प्रताप ने कहा…

बहेतरीन रचना ......आज मानव जाती पेड़ों के साथ बहत बेरहमी से पेश आ रहा है ....आपकी रचना ये अहसास दिला रही है ......इस सजीव पर निर्जीव जैसे व्यहार न करें .......बहुत बहुत आभार

भूतनाथ ने कहा…

आप बुरा मत मान जाना......मगर थोडा सा और गहरा उतरें ना प्लीज़.....लिखने की शुरुआत कर ही दी है तो थोडा सा और गहरा उतर कर देखो ना.....आपकी चीज़ें लाज़वाब बन जायेंगी.....सच.....!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बढ़िया सन्देश देती रचना!

Babli ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और शानदार रचना! आपने रचना के माध्यम से बहुत ही बढ़िया सन्देश दिया है! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

BrijmohanShrivastava ने कहा…

पर्यावरण पर इससे अच्छी रचना कोइ हो नहीं सकती क्योंकि इस रचना में बचपन की भावना जुडी है | वहीं काटने वाले को आपराधी और उसे कड़ी सजा का प्रावधान है ,आने वाले भविष्य की चिंता है ( आगामी पीढी की ) और म्रत्यु पूर्व साया तक नसीब न होने की चेतावनी है

kunwarji's ने कहा…

"सज़ा-ये-मौत,तुम्हें तो चाहिए मिलनी

अन्य सज़ा कोईभी,नही है काफी,

और किसी काबिल हो नही..."

BAS YAHI KEHNA CHAUNGA ABHI TO.....

kunwar ji,

SAMVEDANA KE SWAR ने कहा…

एक वेदना का सम्वेदनात्मक चित्रण …अंतिम पंक्तियाँ मर्म स्पर्शी हैं..मृत्युशय्या पर धूप में पाओगे... अजहूँ चेत गँवार!!!

CS Devendra K Sharma ने कहा…

bahut achha chitran aur utna hi achha sandesh bhi.....badhai!

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) ने कहा…

बहुत ही प्यारा सन्देश.. काश हम लोग इसे समझे..

निर्झर'नीर ने कहा…

sarthak rachna ..kya karen insan ka zamiir mar raha hai

M VERMA ने कहा…

अए, दरिन्दे! करनेवाले धराशायी,इन्हें,
तू तो मिट ही जायेगा,मिटनेसे पहले,
याद रखना, बेहद पछतायेगा.....!

पछता रहे हैं पर मानता कौन है!!!!!!!!

रचना दीक्षित ने कहा…

पर्यावरण का पाठ पढ़ाती एक लाज़वाब प्रस्तुती

alka sarwat ने कहा…

paryawaran bachane ke liye marmik sandesh hai ye

भूतनाथ ने कहा…

आप बुरा मत मान जाना......मगर थोडा सा और गहरा उतरें ना प्लीज़.....लिखने की शुरुआत कर ही दी है तो थोडा सा और गहरा उतर कर देखो ना.....आपकी चीज़ें लाज़वाब बन जायेंगी.....सच....

Shekhar Suman ने कहा…

behtareen rachna.....
kaash main bhi aisa likh pata...
maine v koshish ki hai.....please visit...
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aapke margdarshan ki jaroorat hogi............

अनकही.... ने कहा…

पहले तो मेरे ब्लाग पर आपकी प्रतिक्रया के लिए शुक्रिया और दूसरा ये कि आपके दोनो ही ब्लाग से बड़ी अजीब सी फीलिंग होती है...ऐसी जैसे लिखने वाले ने कभी कुछ खोया हो....हो सकता है मै गलत हूं लेकिन..

ज्योति सिंह ने कहा…

अए, दरिन्दे! करनेवाले धराशायी,इन्हें,

तू तो मिट ही जायेगा,मिटनेसे पहले,

याद रखना, बेहद पछतायेगा.....!



आनेवाली नस्ल्के बारेमे कभी सोचा,

कि उन्हें इन सबसे महरूम कर जायेगा?

मृत्युशय्यापे खुदको, कड़ी धूपमे पायेगा!!
bahut hi sundar rachna lagi ,isme aaj ke sandarbh ko rakkha gaya hai aur aham baat kahi gayi hai ,kash sab ko ilm ho jaaye is baat ka

सीमा सचदेव ने कहा…

सच में पर्यावरण संभाल आज हमारा पहला फ़र्ज़ है , अच्छा संदेश देती आपकी कविता खूबसूरत है

बेचैन आत्मा ने कहा…

अच्छे भाव जगाती रचना।
नश्तर सा चुभता है उर में कटे वृक्ष का मौन
नीड़ ढूंढते पागल पंछी को समझाए कौन!

mridula pradhan ने कहा…

very good.

संजय भास्कर ने कहा…

एक लाज़वाब प्रस्तुती