बुधवार, 31 मार्च 2010

एक राह अकेली-सी

एक राह अकेली-सी.....

आसमान नीले रंगका सिल्क। रास्ता बना है हाथ कारघेसे बने सिल्क के पुराने दुपट्टेके तुकडेमे से........जिसपे मैंने तर्खानी होते समय, लकडी का भूसा जमा कर लिया और उपरसे चिपका दिया....आगेकी और जो घांस आदि दिख रहा है, वो पहले तो एक छापा हुआ कपड़े का टुकडा है...उपरसे, कुछ पेंट और कुछ कढाई....पेड़ पूरी तरहसे कढाई करके बनाया है...  ये चित्र मैंने एक यादगार तसवीर परसे बनाया गया है....









22 टिप्‍पणियां:

के.आर.रमण ने कहा…

बहुत खूबसूरत कविता। एक आग्रह यह कि कृपया फोंट साइज थोड़ा बढा दें।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

शब्दों के साथ चित्र ने मन मोह लिया.

vibha ने कहा…

aaj ka saty yahee hai vo din ab kanha lout paenge.........

bhavuk kar jane walee rachana.............

dipayan ने कहा…

बहुत ही सुन्दर चित्र बनाया है । और वैसी ही सुन्दर शब्दो से पिरोई हुई कविता । सच आजकल वो पहले जैसा माहौल कहाँ?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

अतीत में जाना अच्छा लगा!

बहुत सुन्दर पोस्ट!

Shekhar Suman ने कहा…

BEHTAREEN CHITRA AUR KAVITA USSE V BEHTAREEN.......

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) ने कहा…

सुन्दर!! और जैसा सबने कहा इस चित्र ने जैसे खुद ही कविता कह दी हो..

Rakesh ने कहा…

kshama ...wah
beetedfino ki yaad aur aaj ka samay dono ke madhya insaan ki vyatha ...badlav ..adhunikta ..pragti mein nasht hota swa ....aur apna mool..apni paramparain v apni prakrti .....sab ek saath ...ek kavita mein kitne chitra ....

vikas ने कहा…

जनसँख्या बढ़ने से वनस्पतियों को कुर्बानी देनी पड़ी,,,,अब गावँ भी गावँ नहीं रहा ........

लता 'हया' ने कहा…

कुछ मत कहिये ,खामोश रहिये तो सब ठीक है वरना .........
शुक्रिया aur main kya kahun apki painting ke aur kavita ke liye ?
ati ati sundar.

Apanatva ने कहा…

paristhitiya badal gayee hai aur yade thamee see jamee jamee see hai....................
beeta samay lout kar kanha aata hai...........
ha yade sath nibhatee hai....... sada sath rahatee hai .
bahut sunder rachana.........

शारदा अरोरा ने कहा…

कढाई किया हुआ दृश्य सुन्दर है और कविता भी | आपने नाम दिया ' एक राह अकेली सी ' और इतने सारों को सफ़र पर ले गईं .....बचपन की पगडंडियों ने आपको बहुत भावुक बना दिया है | अच्छा , फॉण्ट बड़ा करने के लिए , जिस पेज पर आप पोस्ट लिख रही हों , लिखे हुए पार्ट को सिलेक्ट करें और ठीक पेज के ऊपर टी के ऊपर क्लिक करें , वहाँ आपको साइज के लिए ऑप्शन मिलेंगे , छाँट लें , इसकी जगह बोल्ड लेटर्ज वाला ऑप्शन भी ले सकती हैं |फिर वापिस पेज पर आकर करसर दबा दें | अगर आपको पता है तो माफ़ कीजियेगा फालतू समय लेने के लिए |

Shekhar Suman ने कहा…

aapki pratikriya ka shukriya...
meri nayi rachna jaroor dekhein...
aapki pratikriya ka intzaar rahega...

abhi ने कहा…

खूबसूरत कविता...बहुत ही अच्छी कविता

प्रदीप कांत ने कहा…

अतीत में जाना अच्छा ही लगता है ...

BrijmohanShrivastava ने कहा…

पिछली पोस्ट भी पर्यावरण पर ही थी |पेड़ पर कुल्हाड़ी चलने का यह परिणाम निकला कि खेत सूख गया और खेत खेत न रहा |जब खेत ही नहीं तो पगडंडी भी नहीं |सब कुछ सपना हो कर रहा गया या सपने में दखने लगा |उत्तम |

निर्झर'नीर ने कहा…

BrijmohanShrivastava ji ne bashi kaha hai ..

"सब कुछ सपना हो कर रहा गया या "

विजयप्रकाश ने कहा…

वाह...किसान का यथार्थ दर्शा दिया है.कढ़ाई भी बढ़िया है

M VERMA ने कहा…

कुल्हाड़ी चलाने वाले चला के चले जाते है
न जाने कितने जख्म दिलो पे दे जाते है

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

सपनों को हकीक़त के साथ बिठा दी आपने .... बड़ा कठिन काम कर दिया आपने !

sandhyagupta ने कहा…

ना वो खेत रहा ,न पगडंडी,
गिरवी रह गयी ज़मीं,
सूख गयी सारी खेती,
पेड पे चल गयी कुल्हाडी...

kulhari vastav me pedon par nahin varan hum apne pairon par mar rahe hain. Is rachna ke liye badhai.

sangeeta ने कहा…

चित्र बहुत सुन्दर लगा और आपकी कवितायेँ भी....
प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद.