रविवार, 21 फ़रवरी 2010

चराग के सायेमे .......

एक मजरूह रूह दिन एक
उड़ चली लंबे सफ़र पे,
थक के कुछ देर रुकी
वीरानसी डगर पे .....

गुज़रते राह्गीरने देखा उसे
तो हैरतसे पूछा उसे
'ये क्या हुआ तुझे?
ये लहूसा टपक रहा कैसे ?
नीरसा झर रहा कहाँसे?'

रूह बोली,'था एक कोई
जल्लाद जैसे के हो तुम्ही
पँख मेरे कटाये,
हर दिन रुलाया,
दिए सैंकडों ज़खम्भी,
उस क़ैद से हू उड़ चली!

था रौशनी ओरोंके लिए,
बना रहनुमा हज़ारोंके लिए
मुझे तो गुमराह किया,
उसकी लौने हरदम जलाया
मंज़िलके निशाँ तो क्या,
गुम गयी राहभी!

किरनके लिए रही तरसती
ना जानू कैसे मेरे दिन बीते
कितनी बीती मेरी रातें,
गिनती हो ना सकी
काले स्याह अंधेरेमे !

चल,जा,छोड़, मत छेड़ मुझे,
झंकार दूँ, मैं वो बीनाकी तार नही!
ग़र गुमशुदगीके मेरे
चर्चे तू सुने
कहना ,हाँ,मिली थी
रूह एक थकी हारी ,
साथ कहना येभी,
मैंने कहा था,मेरी
ग़ैर मौजूदगी
हो चर्चे इतने,
इस काबिल थी कभी?

खोजोगे मुझे,
कैसे,किसलिये?
मेरा अता ना पता कोई,
सब रिश्तोंसे दूर चली,
सब नाते तोड़ चली!
बरसों हुए वजूद मिटे
बात कल परसों की तो नही...

शमा

14 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

खोजोगे मुझे,
कैसे,किसलिये?
मेरा अता ना पता कोई,
सब रिश्तोंसे दूर चली,
सब नाते तोड़ चली!
बरसों हुए वजूद मिटे
बात कल परसों की तो नही...
वाह बहुत सुन्दर कविता है. कभी-कभी अचेतन मन भी कुछ अच्छा करवा ही लेता है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

खोजोगे मुझे,
कैसे,किसलिये?
मेरा अता ना पता कोई,
सब रिश्तोंसे दूर चली,
सब नाते तोड़ चली!
बरसों हुए वजूद मिटे
बात कल परसों की तो नही...

सुन्दर अभिव्यक्ति!

Apanatva ने कहा…

sunder abhivyktikee hai aapne apane bhavo kee .

Rishi ने कहा…

साथ कहना येभी,
मैंने कहा था,मेरी
ग़ैर मौजूदगी
हो चर्चे इतने,
इस काबिल थी कभी?

खोजोगे मुझे,
कैसे,किसलिये?
मेरा अता ना पता कोई,
सब रिश्तोंसे दूर चली,
सब नाते तोड़ चली!
बरसों हुए वजूद मिटे
बात कल परसों की तो नही..

रूह की वेदना की अतिसुन्दर अभिव्यक्ति..बधाई शमा जी ..!!

भवदीय,
ऋषि श्रीवास्तव
भोपाल --> पुणे
http://rishiudgam.blogspot.com/

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

क्षमा जी , आज आपकी कविताएँ पढ़ी ! बहुत गहरा दर्द समेटे एक टीस, एक बेचैनी की पुरकशिश झलक दिखाई देती है उनमें जो पाठक को बहुत शिद्दत से अपनी और खींचती है ! ऐसी रचनाएँ ही मन कोछू पाती हैं जो मन से निकलती हैं !

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर भाव!

anamika ने कहा…

jinki bewfaai mashhoor hai zamaane me,unka hi zikr huaa fir mere fasaane me, chand lamho ki thi zindagi meri,sadi laga din magar usne aane me,,,,,,

Aparna ने कहा…

very beautiful

बूझो तो जानें ने कहा…

Aapki yeh rachna bahut achi lagi.

Prem Farrukhabadi ने कहा…

Rachna sachmuch sarahneey hai. Badhai!!

देवेश प्रताप ने कहा…

जवाब नहीं ,......इस रचना का

KSS Kanhaiya (के एस एस कन्हैया) ने कहा…

सुन्दर रचना के लिए बधाई.

ज्योति सिंह ने कहा…

खोजोगे मुझे,
कैसे,किसलिये?
मेरा अता ना पता कोई,
सब रिश्तोंसे दूर चली,
सब नाते तोड़ चली!
बरसों हुए वजूद मिटे
बात कल परसों की तो नही
kya khoob likhti hai ,jawab nahi ,bas padhte hi rahoon har shabd ,kitni gahraai hai ,umda