सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

पहलेसे उजाले...

 

छोड़  दिया  देखना  कबसे 

अपना आईना हमने!

बड़ा बेदर्द हो गया है,
पलट के पूछता है
कौन हो,हो कौन तुम?
पहचाना नही तुम्हे!
जो खो चुकी हूँ मैं
वही ढूँढता है मुझमे !
कहाँसे लाऊँ पहलेसे उजाले
बुझे हुए चेहरेपे अपने?
आया था कोई चाँद बनके
चाँदनी फैली थी मनमे
जब गया तो घरसे मेरे
ले गया सूरज साथ अपने!

10 टिप्‍पणियां:

ह्रदय पुष्प ने कहा…

कहाँसे लाऊँ पहलेसे उजाले
बुझे हुए चेहरेपे अपने?
आया था कोई चाँद बनके
चाँदनी फैली थी मनमे
जब गया तो घरसे मेरे
ले गया सूरज साथ अपने!
दर्द का समंदर - बहुत खूब - अति सुंदर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना!

Apanatva ने कहा…

asar chod gayee ye rachana.....

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सुन्दर कविता है दी..

ktheLeo ने कहा…

Vaah!

Kulwant Happy ने कहा…

शब्दों में क्या क्या पिरोया जा सकता है। अब पता चला।

AKHRAN DA VANZARA ने कहा…

"जब गया तो घर से मेरे ..."

वाह ! क्या बात है ....!!!.

बहुत सुन्दर भाव-अभिव्यक्ति ....

भग्वान आप की कलम को और बल बख्शे ...

---- राकेश वर्मा

kavi kulwant ने कहा…

ati sundar.. kshama ji..

sangeeta swarup ने कहा…

व्यथा को सुन्दर शब्द दिए हैं.....

manu ने कहा…

bahut sunder klikhaa hi aapne...

aainaa.....
poochhtaa hai ...

waah..