बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

आहट

दूर  से  इक आहट आती रही,

ज़िंदगी का  सामाँ   बनाती रही,
चुनर हवा में उडती रही,
किसीने आना था नही,
हवा फिर भी गुनगुनाती रही..
दूर से इक आहट आती रही..











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16 टिप्‍पणियां:

Apanatva ने कहा…

sunder bhav.acchee rachana.....Badhai.......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर!

sangeeta swarup ने कहा…

दूर से एक आहत आती रही.....

वाह बहुत खूबसूरत...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

क्षमा जी, आदाब
ज़िंदगी का सामाँ बनाती रही,
चुनर हवा में उडती रही,
किसी ने आना था नही,
हवा फिर भी गुनगुनाती रही..
दूर से इक आहट आती रही..
चंद पंक्तियों में समेट दिया
...ये आहटों का फ़रेब

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन अभिव्यक्ति!

Ravi Rajbhar ने कहा…

Bahut khub...
dur se ek ahat aati...kam shabdo me bat badi.

ram ray ने कहा…

BAHUT AACHA,
MY BLOG RAMRAYBLOGSPOST.BLOGSPOST.COM

ram ray ने कहा…

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संजय भास्कर ने कहा…

बहुत जोरदार rachnaa..

संजय भास्कर ने कहा…

namaskar visit my new post.......

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

क्या कहूं दी, कभी-कभी इतना मासूम सा लिख देतीं है आप!!!

Prem Farrukhabadi ने कहा…

बेहतरीन!!!

शमीम ने कहा…

आपकी आभिव्यक्ति सुन्दर बन पडी है. शुभकामनाएं..

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

.... बेहद खूबसूरत रचना!!!

ज्योति सिंह ने कहा…

vandana ji sahi kahi ,bahut komal bhav rahte hai aapke
ज़िंदगी का सामाँ बनाती रही,
चुनर हवा में उडती रही,
किसीने आना था नही,
हवा फिर भी गुनगुनाती रही..
दूर से इक आहट आती रही..

shikha varshney ने कहा…

khubsurat panktiyan..
mere blog tak aane ka bahut bhaut shukriya.